रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:

इबादत का पवित्र माहे रमजान अब अंतिम पढ़ाव पर पहुंच चुका है। अभी तीसरा अशरा चल रहा है और मंगलवार को रमजान के 27 रोजे पूरे हो गए हैं रमजान के 27 वें दिन मुस्लिम समाजजनों ने रोजा रखा।
27वीं रमज़ान की रात काफी अहम रहा। इस रात विशेष नमाज तरावीह के दौरान पढ़े जा रहे कुरान की तिलावत पूरी हुई और समाजजनों ने रातभर जागकर इबादत की।
इस बीच विशेष नमाजें व दुआएं की गईं।
मेघनगर नूर ए मोहम्मदी मस्जिद के मौलाना हाफ़िज़ रिजवान साहब के मुताबिक ईद-उल-फितर के लिए चांद देखा जाएगा, अगर 21 अप्रैल को चांद दिखा तो 22 अप्रैल को ईद मनाई जाएगी लेकिन चांद नहीं दिखने पर 23 अप्रैल को ईद की खुशियां मुस्लिमजन मनाएंगे। रमज़ान में तीन अशरे होते हैं जिसमें पहला रहमत, दूसरा मगफिरत और
तीसरा दोजख से निजात का इसमें 1 से 10 रोजे रहमत के होते हैं जिसमें गरीबों, यतीमों की मदद की जाती है।
ज्यादा से ज्यादा खैरात जकात दी जाती है। 11 से 20 रोजे तक मगफिरत के इसमें इबादत कर गुनाहों से माफी मांगी जाती है। वहीं 21 से 30 वें रोजे तक दोजख से निजात का है। इस आखिरी अशरे में कई मुस्लिमजन एतेकाफ में बैठते हैं, एतेकाफ के लिए मुस्लिमजन आखिर के 10 दिनों तक मस्जिद के किसी कोने में बैठकर इबादत करते हैं और खुद को परिवार व दुनिया से अलग रखते हैं।
इस्लामिक मान्यता के अनुसार एतेकाफ में बैठकर इबादत करने वाले लोगों को अल्लाह सभी गुनाहों से मुक्त कर देता है और आपदा भी टलती है। रमज़ान के महीने में शबएकद्र की रात ऐसी भी आती है जिसका सवाब 83 साल की मकबूल इबादत के बराबर होता है।
मस्जिदों में 27 वी रात में कुरआन शरीफ बख्शा गया
मेघनगर मरकज मस्जिद ए अबरार के मौलाना मेहबूब साहब ने बताया कि शबे कद्र की रात में ही कुरआन शरीफ मुकम्मल हुआ था। इसलिए अज़मत के साथ समाजजन ने कुरआन शरीफ की सालगिरह मनाई व मस्जिदों में 27 वीं रात में पूरे महीने तरावीह की नमाज़ में पढ़े गए कुरान को बख्शा गया व दुआ की गई।
इस दुआ में मुल्क में अमन चैन भाईचारे एवं खुशहाली की दुआ मांगी गई। मुस्लिमजन ने 27 वीं शब में रात को जागकर रातभर इबादत की। महीने भर में पढ़ी जाने वाली कुरआन शरीफ को इशा की तरावीह की नमाज़ के बाद कुरान मुकम्मल कर दुआए पढ़ी गई इसके अलावा घरों में भी समाजजन ने रात में 10 से सुबह 5 बजे तक रातभर जागकर इबादत की व कब्रिस्तान में जाकर फातेहा पढ़ी।
शब ए कद्र बड़ी फजीलत वाली रात है
मुकद्दस का मतलब होता है पवित्र जिस दिन छब्बीसवां रोज़ा होता है, उस तारीख को मगरीब के बाद माह-ए-रमज़ान की सत्ताइसवीं रात शुरू होती है। इस रात को ही ‘शब-ए-कद्र’ यानी परम सम्माननीया रात (मोस्ट ऑनरेबल नाइट) कहा जाता है। यह अल्लाह (ईश्वर) की खास मेहरबानी की रात है। इसीलिए अमूमन इसे ही ‘शब-ए-कद्र’ कहा जाता है, क्योंकि इसे परम पवित्रता का दर्जा प्राप्त है। छब्बीसवां रोज़ा इसीलिए मुकद्दस (पवित्र) कहा जाता है क्योंकि इस रोज़े के दिन के बाद (इफ्तार के बाद) सत्ताइसवीं रात शुरू हो जाती है, जिसे ‘शब-ए-कद्र’ कहा जाता है। यह रात (शब-ए-कद्र) इबादत के लिहाज से ऊंचा मुकाम रखती है। सवाल उठता है कि ‘शब-ए-कद्र’ क्या है? जवाब यह है कि शब का मतलब है रात। कद्र का मतलब है सम्मान। इस तरह ‘शब-ए-कद्र’ के मायने हुए ‘सम्मान की रात’। रमज़ान माह के आखिरी अशरे यानी निजात के अशरे में आने वाली ‘शब-ए-कद्र’ दरअसल सम्मान की रात है।
अब दूसरा सवाल यह है कि इस ‘शब-ए-कद्र’ की ऐसी क्या खासियत है कि जो इसे इतनी अहमियत दी गई है? इसका जवाब यह है कि जैसे नदियों में कोई नदी बहुत खास होती है, पर्वतों में कोई पर्वत बहुत खास होता है, दरख्तों में कोई दरख्त बहुत खास होता है, परिंदों (पक्षियों) में कोई परिंदा और दिनों में कोई दिन बहुत खास होता है, वैसे ही रातों में कोई रात बहुत खास होती है। ‘शब-ए-कद्र’ इसीलिए खास है
क्योंकि इसी रात को पवित्र कुरआन नुजूल हुआ।
‘सूरह-कद्र’ में जिक्र है यानी अल्लाह का इशारा है, ‘यकीनन हमने इसे (कुरआन को) शब-ए-कद्र में नाज़िल किया।’ शब-ए-कद्र हजार महीनों से बेहतर है।
मुफ़्ती अशफ़ाक़ इमामे नूरे मोहम्मदी मस्ज़िद मेघनगर
