एपी सिंह/वी.के. त्रिवेदी, लखीमपुर खीरी (यूपी), NIT:

भारतीय संस्कृति, परंपरा और अखंड सौभाग्य का पर्व करवा चौथ वह व्रत है, जिसका सुहागन महिलाओं को पूरे वर्ष बेसब्री से इंतजार रहता है। प्रतिवर्ष कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सुहागन महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष यह व्रत 10 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाया गया।
इस दिन महिलाओं ने निर्जला उपवास रखकर माता पार्वती सहित पूरे शिव परिवार की आराधना की और अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना की। इस व्रत में चंद्रमा का विशेष महत्व होता है। चंद्रोदय के पश्चात रात्रि में व्रत तोड़ा जाता है। व्रती पहले चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं, तत्पश्चात छलनी से चंद्रमा और पति का चेहरा देखकर व्रत का समापन करती हैं। इस वर्ष चंद्रमा को अर्घ्य रात 7:58 बजे के बाद दिया गया।
महिलाएँ इस दिन कठिन तपस्या समान व्रत का पालन करती हैं और विधिवत पूजा-अर्चना कर अपने पति की लंबी आयु, सौभाग्य एवं सलामती की कामना करती हैं। छलनी से करती हैं चंद्रमा और पति का दर्शन व्रत के अंत में महिलाएँ चंद्रमा और अपने पति का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं करतीं, बल्कि छलनी से दर्शन करती हैं। मान्यता है कि छलनी में अनेक छेद होते हैं, जिनसे चाँद के असंख्य प्रतिबिंब दिखाई देते हैं। माना जाता है कि जब महिला छलनी से पति का चेहरा देखती है, तो उसके पति की आयु उतनी गुणा बढ़ जाती है। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की पूजा भी की जाती है।
चंद्रमा को पुरुष रूपी ब्रह्मा का स्वरूप माना गया है। करवा चौथ पति-पत्नी के प्रेम, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक पर्व है। पूजन विधि सुबह सूर्योदय से पहले सरगी खाकर व्रत की शुरुआत की जाती है, जिसे सास अपनी बहू को देती है। दिनभर महिलाएँ निराहार और निर्जला व्रत रखती हैं। शाम को वे सोलह श्रृंगार कर तैयार होती हैं और पूजा करती हैं। इस पूजा में करवा माता, भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश और चंद्रमा की आराधना की जाती है। पूजन के दौरान करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद महिलाएँ छलनी से पहले चंद्रमा को और फिर अपने पति को देखती हैं। इसके बाद पति के हाथों से पानी पीकर और पहला निवाला खाकर व्रत खोलती हैं।
पौराणिक कथाएँ।
वीरवती की कथा:
एक राजकुमारी वीरवती ने अपने भाइयों के छल से झूठा चाँद देखकर व्रत तोड़ दिया, जिससे उसके पति की मृत्यु हो गई। बाद में अपनी सच्ची श्रद्धा और तपस्या से उसने अपने पति को पुनः जीवित कराया।
देवी करवा की कथा:
देवी करवा ने अपने पति को मगरमच्छ से बचाने के लिए यमराज को भी डांट दिया। उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने उनके पति को जीवनदान दिया और आशीर्वाद दिया कि जो महिला करवा चौथ का व्रत रखेगी, उसका सुहाग सदैव अखंड रहेगा।

