नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ़, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

जलगांव जिले के जामनेर से एक अजीब किस्म का मामला सामने आया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मुख्य धारा के मीडिया के पत्रकारों को “बिक गए है” ऐसा कहने के लिए ओछा समझा जाने वाला उदाहरण दिया गया। इसी बात से खफा हो कर मीडिया से संबंध रखने वाले तत्वों ने जामनेर पुलिस स्टेशन में एक सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ असंज्ञेय श्रेणी तहत नोटिस कलमबद्ध करी। यूजर्स ने अपनी पोस्ट में जो कुछ लिखा था या लिखा है उसकी हम पुष्टि नहीं करते वह अब पुलिस जांच के दायरे में है।
इस कार्रवाई को एक राजनीतिक पार्टी ने सोशल मीडिया पर प्रचार का मुद्दा बनाया और ताबड़तोड़ तरीके से पोस्ट ठेलने शुरू कर दिए। सोशल मीडिया बनाम मीडिया की तनातनी का मुख्य कारण मीडिया का राजनीतिक सिस्टम से सवाल नहीं पूछने की उसकी भूमिका में छुपा है। मामले में आरोपी की ओर से विरोध करने के लिए इस्तेमाल किए गए उदाहरण का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन जिस उदाहरण को प्रस्तुत किया गया है उस से आहत हुए पत्रकारों ने उस विषय पर कितनी रिपोर्ट प्रकाशित की है यह संशोधन का विषय है। पत्रकारों की निष्पक्षता अब समाज के लिए चिंता का विषय नहीं रहा। हमारे देश में मुख्य धारा की पत्रकारिता का हाल सब को पता है।
भारत के संविधान में विधायिका कार्यपालिका और न्याय पालिका यह लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभ है। रैमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता रवीश कुमार कहते है ” डरा हुआ पत्रकार लोकतंत्र में मरा हुआ नागरिक पैदा करता है ” अमरीका चुनाव में सारा का सारा कार्पोरेट, पूंजीपति घराने, उद्योग जगत, मीडिया सब कुछ कमला हैरिस के साथ था बावजूद इसके डोनाल्ट ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपती का चुनाव जीत गए। एलेन मस्क ने ट्रंप के लिए कहा था कि जनता ट्रंप का मीडिया है। इन बातों को रेखांकित करना इस लिए आवश्यक है ताकि मीडिया जनता के लिए है लेकिन क्या जनता मीडिया के लिए कुछ मायने रखती है?

