अशफ़ाक क़ायमखानी, ब्यूरो चीफ, जयपुर (राजस्थान), NIT:

भारतीय मुसलमानों और उनके धार्मिक विद्वानों को शिक्षा के क्षेत्र में ईरान से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। यह बात सामाजिक चिंतक अशफाक कायममखानी ने कही। उन्होंने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की तरह शिक्षा की ताकत से देश की सेवा करना हर मुस्लिम समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है।
कायममखानी ने कहा कि करीब चार दशकों तक अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों का सामना करने के बावजूद ईरान ने शिक्षा को हथियार बनाकर उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने दावा किया कि ईरान ने अपने वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के दम पर वैश्विक शक्तियों के सामने मजबूती से खड़े होकर अपनी क्षमता का परिचय दिया है।
उन्होंने बताया कि ईरान में पुरुषों और महिलाओं के बीच शिक्षा को लेकर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। वहां गणित और विज्ञान की उच्च शिक्षा पर विशेष जोर दिया जाता है, जिसके चलते बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं रिसर्च और पीएचडी के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। कई छात्र विदेशों से उच्च शिक्षा प्राप्त कर देश की प्रगति में योगदान दे रहे हैं।
इसके विपरीत, उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में मुस्लिम समाज के भीतर उच्च शिक्षा, विशेषकर विज्ञान और गणित के क्षेत्र में रुचि अपेक्षाकृत कम है। इसके लिए उन्होंने कुछ हद तक धार्मिक नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि सकारात्मक माहौल बनाने की जरूरत है।
कायममखानी ने यह भी कहा कि ईरान में महिलाएं हिजाब में रहते हुए भी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उनके अनुसार, भारतीय मुस्लिम समाज को भी रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि देश की सेवा और प्रगति के लिए आवश्यक है कि मुस्लिम समाज के युवा, चाहे पुरुष हों या महिलाएं, उच्च शिक्षा विशेषकर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ें और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं।

