जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:

नगर निगम भोपाल में पिछले कई वर्षों से जो जानकारी मांगी जाती है वह सही नहीं दी जाती जिसका आज बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री जन कल्याण संबल योजना मे हुए भ्रष्टाचार; को लेकर कुछ लोगों ने आरटीआई के माध्यम से विस्तृत जानकारी मांगी गई थी और मीडिया में अलग-अलग जानकारियां प्राप्त हो रही थी। अभी सही जानकारी प्राप्त नहीं हुई जिन लोगों को झूठा फसाया या अन्याय किया वह लोग न्यायालय की शरण में (कोर्ट) पहुंच गए वह भी सूत्रों के हवाले से खबर है कि निगम के वकील जवाब प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं। कोई जवाब नगर निगम की ओर से अब तक नहीं दिया गयावह भी पूरी तरह प्रगतिशील नगर निगम कर्मचारी विकास उत्थान कल्याण समिति के संरक्षक श्यामसुंदर शर्मा ने सूचना के अधिकार के तहत गलत जानकारी दिए जाने का कड़ा विरोध किया है।
शर्मा का कहना है कि सूचना के अधिकार के तहत गलत जानकारी देना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने नगर निगम आयुक्त भोपाल से अनुरोध किया है कि गलत जानकारी देने वाले अधिकारी-कर्मचारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए और सही जानकारी उपलब्ध कराई जाए। चेतावनी दी गई है कि यदि सही जानकारी नहीं दी गई तो गलत जानकारी के विरुद्ध अपील की जाएगी और धरना प्रदर्शन भी किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी। अधिकार के तहत गलत जानकारी प्रस्तुत करने का मामला गंभीर हो सकता है, क्योंकि यह सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धाराओं का उल्लंघन माना जा सकता है। इस स्थिति में निम्नलिखित पहलुओं पर विचार किया जा सकता है और संबंधित कार्रवाई हो सकती है:
1. कानूनी स्थिति और उल्लंघन
धारा 7(1): आरटीआई अधिनियम के तहत, लोक सूचना अधिकारी (PIO) को 30 दिनों के भीतर सही और पूर्ण जानकारी प्रदान करनी होती है। गलत या भ्रामक जानकारी देना इस धारा का उल्लंघन है।
धारा 8 और 9: यदि जानकारी को जानबूझकर गलत प्रस्तुत किया गया है या छिपाया गया है, और यह देश की सुरक्षा, अखंडता या आंतरिक जांच से संबंधित नहीं है, तो यह गैर-कानूनी माना जा सकता है।
धारा 19: यदि गलत जानकारी दी गई है, तो आवेदक प्रथम अपीलीय अधिकारी (First Appellate Authority) के पास अपील कर सकता है।
धारा 20: यदि यह सिद्ध हो जाता है कि लोक सूचना अधिकारी ने जानबूझकर गलत जानकारी दी या जानकारी देने से मना किया, तो सूचना आयोग द्वारा अधिकारी पर 25,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही, अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश भी हो सकती है।
2. मामला बनने की संभावना
आचरण नियमों का उल्लंघन: यदि भोपाल नगर निगम की कंप्यूटर शाखा के अधिकारी ने जानबूझकर गलत जानकारी दी, तो यह मध्य प्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार बन सकता है।
आपराधिक मामला: यदि गलत जानकारी देने का उद्देश्य धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार छिपाना या किसी को नुकसान पहुंचाना था, तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), धारा 468 (दस्तावेजों में जालसाजी), या अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत मामला दर्ज हो सकता है।
लोकायुक्त जांच: यदि मामला भ्रष्टाचार से संबंधित है, तो मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन इसकी जांच कर सकता है। उदाहरण के लिए, एक समान मामले में, नगरीय प्रशासन विभाग, भोपाल में आरटीआई के तहत गलत जानकारी देने पर सहायक लोक सूचना अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई थी।
3. आवेदक द्वारा उठाए जा सकने वाले कदम
प्रथम अपील (First Appeal): यदि गलत जानकारी दी गई है, तो आवेदक को 30 दिनों के भीतर प्रथम अपीलीय अधिकारी को अपील करनी चाहिए। अपील में गलत जानकारी के सबूत और सही जानकारी की मांग स्पष्ट करनी होगी।
द्वितीय अपील (Second Appeal): यदि प्रथम अपील में संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तो 90 दिनों के भीतर मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की जा सकती है।
शिकायत (Complaint): धारा 18 के तहत, यदि अधिकारी ने जानबूझकर गलत जानकारी दी या जानकारी देने से मना किया, तो सीधे सूचना आयोग में शिकायत की जा सकती है।
लोकायुक्त में शिकायत: यदि गलत जानकारी भ्रष्टाचार या अनुचित लाभ से जुड़ी है, तो लोकायुक्त में शिकायत दर्ज की जा सकती है।
न्यायालय में याचिका: यदि सूचना आयोग से भी न्याय नहीं मिलता, तो आवेदक उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है।
4. उदाहरण और संदर्भ
एक समान मामले में, नगरीय प्रशासन विभाग, भोपाल में आरटीआई आवेदन पर गलत जानकारी देने के लिए सहायक लोक सूचना अधिकारी के खिलाफ सूचना आयुक्त ने कार्रवाई की थी। जांच में पाया गया कि अधिकारी ने जानबूझकर दस्तावेज छिपाए और गलत जानकारी दी। भोपाल नगर निगम के अन्य मामलों में भी अनियमितताएं सामने आई हैं, जैसे कि अवैध निर्माण को वैध करने का मामला, जहां नियमों को ताक पर रखकर कार्रवाई की गई।
5. सुझाव
सबूत संकलन: आवेदक को गलत जानकारी के दस्तावेजी सबूत (जैसे, आरटीआई जवाब की प्रति) और सही जानकारी के स्रोत (यदि उपलब्ध हों) एकत्र करने चाहिए।
अपील प्रक्रिया का पालन: प्रथम और द्वितीय अपील के माध्यम से मामला मजबूत करें।
मीडिया और सामाजिक मंच: यदि मामला गंभीर है, तो मीडिया या सामाजिक मंचों (जैसे X) पर इसे उठाकर दबाव बनाया जा सकता है, बशर्ते यह कानूनी दायरे में हो।
कानूनी सलाह: किसी वकील से सलाह लेकर आपराधिक या सिविल मामला दर्ज करने की संभावना तलाशी जा सकती है।
निष्कर्ष: भोपाल नगर निगम की कंप्यूटर शाखा द्वारा आरटीआई के तहत गलत जानकारी देने का मामला सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत कार्रवाई का आधार बन सकता है। यह अनुशासनात्मक कार्रवाई, जुर्माना, या गंभीर मामलों में आपराधिक मामला बन सकता है। आवेदक को तुरंत प्रथम अपील दायर करनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर सूचना आयोग या लोकायुक्त से संपर्क करना चाहिए। यदि आपके पास विशिष्ट दस्तावेज या और जानकारी है, तो उसे साझा करने पर मैं और विस्तृत सलाह दे सकता हूं।

