नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ़, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

किसानों का आधा माल बिक जाने के बाद कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया CCI की ओर से कपास खरीद शुरू की गई। राजनेता लोकप्रियता की हबीबी से तोलकांटे के पास फोटो खिंचवाने के लिए चले गए। बीड की घटना से कोसो दूर खड़े बोगस दबंग मंत्रीयों को कपास में वो आग नज़र आने लगी है जो किसी दिन उनके द्वारा बेजा तरीके से जमा करी गई हज़ारों करोड़ रुपए की अनैतिक प्रॉपर्टी को जलाकर राख कर देगी। निजी जिनिंग कपास को 6800 का दाम दे रहा है वही सरकारी Cotton Corporation of India (CCI) 7300। यह दाम भी लागत मूल्य और बिनाई मजदूरी के कही आसपास भी नहीं ठहरता। अब हम आपको सरकार ग्रेडर और व्यापारीयों के बीच चल रहे साझा खेल को समझाने का प्रयास करते हैं।

प्रायवेट मार्केट कमेटिया सत्ता में बैठे लोकल नेताओं की जी हुजूरी कर के CCI के ग्रेडर्स को कट कमीशन दे कर प्रति क्विंटल 500-800 कमा रहे है। जामनेर के शेरी लोंढरी में पता चला कि एक कास्तकार ने 6800 के दाम से सारा माल किसी सेठ को दे दिया। पूछताछ करने पर बताया गया कि CCI का 7300 पाने के लिए हफ्तों तक वाहन नंबर में लगाने पड़ते हैं कई वाहन किराए पर लिए हुए होते हैं। ट्रैक्टर और बैल गाड़ी-जोड़ी के अभाव से खेती का सारा कामकाज ठप हो जाता है। CCI में नंबर लग भी गया तो ग्रेडर कपास को सरकारी MSP के लिए अयोग्य करार दे कर 6500-6900 के भीतर भाव देता है। सेठ लॉबी और ग्रेडर्स की आपसी मिलीभगत की शिकायत गुणवत्ता के मानकों पर कहीं भी टिक नहीं पाती किसानों को मजबूरन औने पौने दाम पर कपास बेचना पड़ती है। इस खेल की यह तो ऊपरी परत है अगली रिपोर्ट में हम इस सिस्टम के दूसरे बिंदुओं पर अधिक सामग्रता से प्रकाश डालने की कोशिश करेंगे।
