वी.के.त्रिवेदी, ब्यूरो चीफ, लखीमपुर-खीरी (यूपी), NIT:

मंहगाई चरम सीमा पर पहुंच गयी है। गरीबों की थाली से अभी तक अरहर, उर्द की दाल ही गायब हुई थी अब आलू, प्याज और टमाटर भी गायब हो गये। असली सरसों का तेल पहले ही गायब था, घटिया आयल से बना कड़वा तेल भी 120, 130 रूपये किलो की दर से बिक रहा है। सब्ज़ियों के आसमान छूते रेट से विशेष रूप से सब्ज़ियों का राजा आलू के दामों में भारी उछाल से गरीबों के मुंह का निवाला तक छिनने लगा है।
अन्नदाता का गेहूं, धान, गन्ना सब कौड़ियो के दाम बिक रहा है वहीं सब्ज़ियों, दालों एवं खाद्य तेल और आटे के दाम आसमान छू रहेहैं। गरीब और अमीर दोनों की थाली की महत्वपूर्ण सब्जी आलू 50 व 60 रूपये किलो बिक रहा है, टमाटर 60 से 80 रूपये किलो, अभी तक 70-80 रूपये में बिकने वाली गोभी अब 30 रूपये किलो पर तब आयी। जब मण्डी में स्थानीय कृषकों की उपज आई तो रेट डाउन हो गए, लहसुन 100 से 120 में, प्याज छोटी और छिलके उतरी 60 में तो अच्छी 80 रूपये किलो बिक रही है। ये मौसम आलू बुवाई का भी है और आलू का बीज बाजार से गायब है। बाहर से जो आलू बीज मण्डी में आ रहा है उसके रेट इतने ज्यादा हैं कि जो छोटे-छोटे किसान चार-छः बीघा आलू बोकर तैयार होने पर उसे खुले बाजार में फुटकर बेचकर अपनी जीविका चलाते थे आज वो जूझ रहे आर्थिक संकट के कारण अत्याधिक मंहगे आलू बीज को न खरीद पाने को मजबूर हैं। बड़े कृषक जो चार-छः एकड़ व इससे अधिक की खेती करते है वो मंगी बीज खरीदने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं।
गरीबों की थाली से जिस प्रकार आलू, प्याज, टमाटर, लहसुन गायब हो गया उसी तरह दालें भी गायब हो गयीं। अरहर की दाल 120 रूपये किलो, उर्द की दाल 110 और 120 रूपये किलो, मूंग की दाल 150 रूपये किलो, कम्पनियों का एक लीटर से पांच लीटर तक पैकिंग वाला कड़वा तेल 130 रूपये से 140 रूपये लीटर के भाव से बिक रहा है। वहीं मोहम्मदी में नकली कड़वा तेल जो धान की भूसी से तैयार घूटा आयल से बना नकली कड़वा तेल जो खुले बाजार में बेखौफ 120 रूपये किलो बिक रहा है वहीं ब्रान्डेड कम्पनियों की शीशियों, केनो एवं पीपों में नकली लेबल और पैकिंक के साथ भी बेचा जा रहा है। आमजन 120 रूपये में नकली कड़वा तेल खाने को मजबूर हैं। वहीं वनस्पति घी 140 रूपये, र्फाचून 140 रूपये लीटर के दामों पर पहुंच गया जो अभी तक 90 रूपये में था। यही स्थिति मिर्च और मसालों की है उनके रेट भी आसमान छू रहे हैं। जबसे डीजल, पेट्रोल के रेट बढ़े हैं तबसे हर वस्तु चाहे वो खाद्यान्न हो, सब्जी हो, खाद्य तेल, मसाले हों या आटा हो सभी के रेट आसमान छू रहे हैं। गरीब नमक से रोटी खाने को मजबूर हो रहा है। गरीब एवं मध्यवर्गी जनता इस भीषण मंहगाई में खून के आंसू बहा नहीं रही बल्कि पी रही है और जिम्मेदार यानि सरकार इस मंहगाई का टीकरा भी राहुल और अखिलेश के सिर पर फोड़ रहे हैं।
इस बढ़ती मंहगाई से अन्नदाता भी खासा परेशान है। जब तक उसके खून-पसीने से पैदा की उपज उसके खेतों और घरों में रहती है तब तक उसके दाम कौड़ियों में रहते हैं जबकि उसकी उपज चाहे वो आलू से लेकर गेहूं, धान, गन्ना हो या अन्य फसलें वो जब आढ़तियों से लेकर पूंजीपतियों के पास पहुंच जाती है। ये पूजीपति इन फसलों का स्टोर कर क्रमिक आभाव पैदाकर मनमाने रेट पर बाजार में लाकर बेचते हैं। सरकार का भी इन पूंजीपतियों को संरक्षण प्राप्त होता है जिसके कारण वो न तो रेट नियंत्रित करती है और न कालाबाजारी को ही रोकती है परिणाम स्वरूप मंहगाई अपनी चरम पर है। गरीब ही नहीं मध्यवर्गी तक बेहाल है और खून के आंसू बहा रहा है। इस महंगाई की मार से आमजन को कब राहत मिलेगी ये न कोई सोचने वाला है न बताने वाला।
