अशफाक कायमखानी, जयपुर (राजस्थान), NIT;
भारत भर के मुस्लिम समुदाय की तरह राजस्थान का मुस्लिम समुदाय भी हर समय यह रोना, रोता रहता है कि हमारे इलाकों में विकास नाम मात्र का भी नहीं रहा है। हमारी हालत पर सरकारें भी उतना विचार नहीं करती हैं जितना आवश्यक्तानुसार उन्हें करना चाहिये। पर मुस्लिम समूदाय यह कतई मानने को तैयार नहीं है कि संविधान व सरकारी नियमों में उन्हें भी नागरिक होने के नाते मिले अधिकारों का वो उपयोग रत्तीभर भी करने को तैयार नजर नहीं आता है। देखने में तो यहां तक आया है कि मोहल्ले में व्याप्त गंदगी से दिन-रात परेशान व बीमार होना मंजूर है लेकिन उनमें से कोई आदमी चलकर लिखित में एक शिकायत पत्र लेजाकर सम्बन्धित नगर पालिका/परिषद/निगम के दफ्तर में दर्ज करवाकर आना मंजूर नहीं है। अगर वहां शिकायत दर्ज करवाने पर भी कुछ भी राहत चाहे न मिले पर निराश कभी ना हो, फिर लिखित शिकायत पर शिकायत दर्ज करवाये। कोई रिजल्ट न आये तो सम्बन्धित आला अधिकारी तक लिखित शिकायत दर्ज करवायें, साथ ही विभिन्न सरकारी पोर्टल पर शिकायत दर्ज करवानी चाहिये। यानी की किसी भी विभाग के सम्बन्धित शिकायत लिखित में ही दर्ज करवाने में पारंगत होना ही आज की असल जरुरत है। विभिन्न स्तर पर लिखित ज्ञापन देने की आदत दिनचर्या में डालनी ही होगी।
अक्सर देखने में आया है कि हम साल भर चिल्लाते रहते हैं। आपस में निराशा के भाव में आपस में आरोप-प्रत्यारोप लगाने में समय खपाते रहते हैं, लेकिन किसी भी विभाग या सरकार के बजट बनते व योजनाओ का खाका तैयार होते समय पुरी तरह कुम्भकर्णी नींद में सोये रहते हैं। बजट व योजनाओं का खाका मुकम्मल होने के बाद हम आंखे मलते हुये उठते हैं तो क्या होना है? उसके बाद क्या खाक होना है। बुजुर्गो से अनेक कहावतें सुनी हैं जिनमें यह भी है कि “सुतेडा की भैंस हमेशा पाडा लाती है”। वही निकल गई गणगोर मोल्या मोड़ा आयो रे।
हालांकि किसी भी तरह का प्रतिवेदन/शिकायत/ज्ञापन देने से पहले उस विषय की वास्तविक जानकारी ले ली जाये तो आपकी बात में वजन बढता है। हवा में तीर मारने से निशाने पर तीर नहीं लग पाता है। निशाना साध कर ही तीर मारने से चोट निशाने पर ही लगती है। विषय वस्तू की पुरी जानकारी के अनेक साधन मौजूद हैं। पर इनमें सबसे सटीक साधन आज के समय सुचना का अधिकार ही माना जा रहा है। तो इसका उपयोग अधिकाधिक करने का अपनी दिन चर्या मे उतारना ही होगा।
अगर सुचना के अधिकार का उपयोग करने का सिलसिला अपनी जीवनशेली में उतार लिया तो आप अपने जनप्रतिनिधी व प्रशासनिक अधिकारी पर भी नजर रख सकते हैं। मिसाल केरतौर पर आप अपने विधायक/सांसद द्वारा करवाये जाने वाले अपने विवेक कोटे से या अन्य योजनाओं के मार्फत होने वाले विकास कार्यो की पुरी जानकारी लेकर आप तय कर सकते हैं कि आपको अपना हक मिला या नहीं। या फिर हमेशा की तरह उनकी तरफ से मिठ्ठी गोली ही दी जा रही है।
लिखित शिकायत पर नब्बे के दशक का दिल्ली का एक वाकया ब्यान करता हूं। दिल्ली नगर निगम का एक निरीक्षक वहाँ की साफ सुथरी व पाॅश कोलोनी का इन्चार्ज था। लेकिन वह पुरा दवाब बनाकर उस पाॅश इलाके की बजाय गन्दगी के आलम में रहने वाले मुस्लिम इलाके का इन्चार्ज बनने के लिये विभिन्न तरह के सियासी दवाब लगा रहा था। पुछने पर बताया कि हां उसे पता है कि जिस इलाके में वह लगना चाहता है वहाँ काफी गंदगी है। लोगों को बोलने में भी अजीब है, पर उसने कहा कि इन सब दिक्कतों के बावजूद यहां का कोई भी बंदा लिखित शिकायत लेकर विभाग तक नहीं जाता है। जबकि साफ सुथरे पाॅश कोलेनी में जरा सा भी सुबह टहलने वाले लोगों को कहीं पर भी कचरा व परेशानी नजर आई तो वो दस बजे घर से बाहर जाते समय विभाग में एक अर्जी भी टिका जायेंगे। यानि लिखित शिकायत पेण्डिंग पर पेण्डिग होती ही रहती है।
कुल मिलाकर यह है कि मुस्लिम समुदाय को रोज रोने की बजाय सुचना के अधिकार का अधिकाधिक उपयोग करना होगा। वहीं किसी भी डिमांड के लिये कागज चलाने में पुरी तरह पारंगत होना ही होगा।
