क्या इस देश में मुसलमान होना अपराध है?मौलाना महमूद असद मदनी | New India Times

अबरार अहमद खान/मुकीज़ खान, नई दिल्ली/भोपाल (मप्र), NIT:

क्या इस देश में मुसलमान होना अपराध है?मौलाना महमूद असद मदनी | New India Times

जमीअत उलमा-ए-हिंद की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में देश में बढ़ती धार्मिक नफरत, इस्लामोफोबिया, मॉब लिंचिंग और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर गहरी चिंता जताई गई।  जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा कि मुसलमानों को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करने वाले वास्तव में देश के दुश्मन हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भारत में मुसलमान होना अपराध है? हरियाणा के नूंह-मेवात में आयोजित बैठक में वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा, अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकार, फिलिस्तीन में युद्धविराम और राष्ट्रीय एकता सहित कई मुद्दों पर प्रस्ताव पारित कर सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की गई।

उन्हों ने कहा कि मुसलमान इस देश में किसी की दया या किसी सांप्रदायिक समूह के एहसान के कारण नहीं रह रहे हैं, बल्कि इस देश की आजादी में उनके पूर्वजों की महान कुर्बानियां शामिल हैं। उनकी कब्रें आज भी इस धरती की गोद में उस ऐतिहासिक सच्चाई की गवाही दे रही हैं।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हमने इस देश को आजाद कराने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर किया है। इसलिए हमें अपने ही देश में अजनबी या दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोई भी कोशिश सफल नहीं हो सकती।
मौलाना मदनी आज जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारिणी समिति की दो दिवसीय बैठक को संबोधित कर रहे थे। यह बैठक 30 और 31 अक्टूबर को डीएलडी स्प्रिंगफील्ड, पीपाका, नूंह, मेवात, हरियाणा में आयोजित की गई।

क्या इस देश में मुसलमान होना अपराध है?मौलाना महमूद असद मदनी | New India Times

बैठक में देश की वर्तमान स्थिति, इस्लामोफोबिया, समान नागरिक संहिता (यूसीसी), वक्फ संपत्तियों, इस्लामी जगत एवं फिलिस्तीन तथा जमीअत के संगठनात्मक और रचनात्मक कार्यक्रमों सहित विभिन्न विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। इसके बाद कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए।
इस बैठक में दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी, जमीअत उलमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना मुहम्मद सलमान बिजनौरी, जमीअत उलमा-ए-हिंद की स्थायी समिति के अध्यक्ष मौलाना रहमतुल्लाह मीर कश्मीरी तथा नायब अमीर-ए-हिंद मौलाना मुहम्मद सलमान मंसूरपुरी सहित कई प्रमुख हस्तियों ने अपने विचार रखे।
जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने पिछली बैठक की कार्यवाही पढ़कर सुनाई, सचिवीय रिपोर्ट प्रस्तुत की और अंत में धन्यवाद ज्ञापन भी किया।
इस अवसर पर एक घोषणा-पत्र भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि जमीअत उलमा-ए-हिंद हमेशा से राष्ट्रीय एकता और आपसी सम्मान की पक्षधर रही है। वह हर प्रकार की सांप्रदायिकता को देश के लिए नुकसानदेह मानती है। धर्म के नाम पर देश को बांटने की राजनीति न तो कल स्वीकार्य थी, न आज है और न ही भविष्य में कभी स्वीकार्य होगी।
जमीअत देश के प्रत्येक पीड़ित, वंचित और कमजोर वर्ग के अधिकारों के लिए आवाज उठाने तथा किसानों, विद्यार्थियों, दलितों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ खड़े रहने का संकल्प दोहराती है।
यह भी कहा गया कि हमारी नई पीढ़ी निराशा और भय के बजाय साहस, हिम्मत और दृढ़ संकल्प की विरासत को आगे बढ़ाए। वह विवेक और साहस के साथ अन्याय का मुकाबला करे तथा सत्य और न्याय के लिए हमेशा डटी रहे।

देश संवैधानिक और वैचारिक संकट से गुजर रहा है
मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि आज देश ऐसे नाजुक दौर से गुजर रहा है, जब उसकी लोकतांत्रिक भावना और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
नफरत और भेदभाव का माहौल केवल मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को ही निशाना नहीं बना रहा है, बल्कि इससे दलितों, वंचित वर्गों और कानून के शासन की पूरी व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है।

क्या इस देश में मुसलमान होना अपराध है?मौलाना महमूद असद मदनी | New India Times


भारत में मुसलमान होना अपराध बना दिया गया है


उन्होंने कहा कि आज यह सवाल बेहद गंभीरता के साथ सामने आ रहा है कि क्या भारत में मुसलमान होना अपराध बना दिया गया है? नफरत भरे बयानों को अब केवल चुनावी राजनीति का अस्थायी हथकंडा मानना सही नहीं होगा, बल्कि देश को एक ऐसे वैचारिक संघर्ष की ओर धकेला जा रहा है, जिसकी बुनियाद धार्मिक भेदभाव पर टिकी है।दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि एक विशेष समुदाय के खिलाफ होने वाले अत्याचार और अन्याय को कुछ वर्गों में राष्ट्रीय गौरव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
उन्होंने पिछले एक वर्ष के दौरान नफरत भरे भाषणों और बयानों की 1,600 से अधिक प्रमाणित घटनाओं का उल्लेख किया। साथ ही बताया कि इनमें से 87 प्रतिशत मामलों में प्राथमिकी (एफआईआर) तक दर्ज नहीं की गई।उन्होंने कहा कि यह स्थिति कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी और न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
बुलडोजर की कार्रवाई संविधान, कानून और न्यायपालिका की गरिमा पर हमला है
तथाकथित ‘बुलडोजर न्याय’ की कड़ी आलोचना करते हुए मौलाना मदनी ने कहा कि प्रशासन न्यायपालिका के अधिकारों में हस्तक्षेप करते हुए खुद ही जज और खुद ही जल्लाद की भूमिका निभा रहा है।
उन्होंने कहा कि बुलडोजर किसी ईंट-गारे से बनी इमारत पर नहीं चलता, बल्कि वह देश के संविधान, कानून के शासन (रूल ऑफ लॉ) और न्यायिक गरिमा के सीने पर चलता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी नागरिक के घर या संपत्ति को न्यायिक प्रक्रिया और कानूनी आवश्यकताओं की अनदेखी करके ध्वस्त करना केवल एक इमारत को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि संविधान और न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करना है।
बहुसंख्यक समुदाय को कोई खतरा नहीं, बल्कि कुर्सी और सत्ता की लालसा है
बहुसंख्यक समुदाय को खतरे में बताने वाले विमर्श पर सवाल उठाते हुए मौलाना मदनी ने कहा कि जब देश गुलाम था, तब बहुसंख्यक समुदाय को कोई खतरा महसूस नहीं हुआ, लेकिन जब देश आजाद हुआ और धर्मनिरपेक्ष संविधान लागू हुआ, तो अचानक बहुसंख्यक समुदाय के खतरे में होने का प्रचार शुरू हो गया।
उन्होंने कहा कि वास्तव में यह बहुसंख्यक समुदाय के खतरे का मामला नहीं, बल्कि कुर्सी और सत्ता की लालसा का मामला है। जब सरकार युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने, किसानों की समस्याओं का समाधान करने और अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने में विफल होती है, तो जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाने के लिए घुसपैठ, घुसपैठिए और ‘जनसंख्या जिहाद’ जैसे विमर्श गढ़े जाते हैं।
उन्होंने जमीअत उलमा-ए-हिंद के विभाग ‘जस्टिस एंड एम्पावरमेंट फॉर माइनॉरिटीज’ (JEM) द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि गृह मंत्रालय ने संसद में लिखित रूप से स्वीकार किया है कि सरकार के पास अवैध घुसपैठ से संबंधित कोई प्रमाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद मुसलमानों के खिलाफ जनसांख्यिकीय भय का माहौल बनाया जा रहा है।
उन्होंने कहा, “मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि हम भारत में किसी भी विदेशी नागरिक के रहने के समर्थक नहीं हैं।”
*शिकायतें छोड़कर संघर्ष के मैदान में उतरने की जरूरत है*
मौलाना मदनी ने जमीअत के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सक्रिय संघर्ष का संदेश देते हुए कहा:
“रोना-धोना और शिकायतें करना बंद करें! मैदान में उतरकर एक मजबूत योद्धा की तरह खड़े हो जाएं!”
उन्होंने कहा कि जीवंत कौमें परिस्थितियों का रोना नहीं रोतीं, बल्कि अपने संकल्प और कर्म से इतिहास की दिशा बदलती हैं। हमें निराशा, भय और कायरता से बाहर निकलकर बहादुरी, साहस, हिम्मत और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा।
*अमल के बिना इस्लाम की रक्षा का दावा अर्थहीन है*
मौलाना मदनी ने हजरत शेखुल इस्लाम मौलाना सैयद हुसैन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैह का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे बुजुर्गों ने बार-बार यह शिक्षा दी है कि धर्म की प्रतिष्ठा और बुलंदी केवल नारों, भाषणों और दावों से नहीं, बल्कि अपने जीवन को धर्म के अनुरूप ढालने से हासिल होती है।
उन्होंने हजरत शेखुल इस्लाम के इस बुनियादी संदेश की याद दिलाते हुए कहा कि इस्लाम की रक्षा का दावा करने वालों को सबसे पहले अपने भीतर इस्लाम को आत्मसात करना चाहिए। अमल से बचना और जुबान से बड़े-बड़े दावे करना सही तरीका नहीं है।
संगठनात्मक मतभेदों के संबंध में उन्होंने कहा कि विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक बात है। इसे विरोध समझ लेना नेतृत्व की कमजोरी है। प्रत्येक व्यक्ति की राय और अनुभव एक समान नहीं हो सकते।
हमें मतभेद रखने वालों की बात सुनने, उनके तर्कों पर विचार करने और सही बात को स्वीकार करने का साहस पैदा करना होगा।

कार्यकारिणी समिति द्वारा आज पारित प्रस्ताव

क्या इस देश में मुसलमान होना अपराध है?मौलाना महमूद असद मदनी | New India Times


कार्यकारिणी समिति ने आज देश और कौम के सामने मौजूद महत्वपूर्ण समस्याओं पर विस्तार से विचार-विमर्श करने के बाद कई प्रस्ताव पारित किए।
कार्यकारिणी समिति ने देश में मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती नफरत भरी तकरीरों, इस्लामोफोबिया, मॉब लिंचिंग तथा सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार के संगठित अभियान पर गहरी चिंता व्यक्त की। साथ ही मांग की कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तहसीन पूनावाला मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों पर अमल करते हुए प्रत्येक जिले में पुलिस अधीक्षक (एसपी) स्तर के नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएं तथा नफरत पर आधारित अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जाएं।
कार्यकारिणी समिति ने गृह मंत्रालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय जनसांख्यिकीय समिति की गैर-वैज्ञानिक संरचना और पक्षपातपूर्ण धारणाओं पर चिंता व्यक्त की। उसने मांग की कि यदि सरकार वास्तव में जनसंख्या का सही अध्ययन करना चाहती है तो अंतरराष्ट्रीय मानकों के विशेषज्ञों पर आधारित एक निष्पक्ष आयोग का गठन किया जाए।
कार्यकारिणी समिति ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को अपने वर्तमान स्वरूप में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के धार्मिक एवं संवैधानिक अधिकारों तथा वक्फ की मूल भावना के विरुद्ध करार दिया और सरकार से इस पर पुनर्विचार करने की मांग की। बैठक में वक्फ संपत्तियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की तर्ज पर एक स्वतंत्र और अधिकार-संपन्न संस्था गठित करने का प्रस्ताव भी पेश किया गया।
कार्यकारिणी समिति ने इस्लामी जगत के कई देशों में जारी युद्ध की स्थिति और फिलिस्तीन के लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे पर गहरी चिंता व्यक्त की। उसने एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना, इजरायली बस्तियों के निर्माण पर रोक, युद्ध अपराधों के जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने, मस्जिद-ए-अक्सा और अन्य पवित्र स्थलों की सुरक्षा तथा गाजा और फिलिस्तीन के अन्य क्षेत्रों में मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
कार्यकारिणी समिति ने नई पीढ़ी की धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा-दीक्षा, ईमान और आस्था की सुरक्षा तथा इस्लामी पहचान को मजबूत बनाने को समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया।
कार्यकारिणी समिति ने केंद्रीय, प्रांतीय, जिला, शहरी और स्थानीय इकाइयों को निर्देश दिया कि वे अपने संवैधानिक दायित्वों के अनुरूप वार्षिक कार्ययोजना तैयार करें और उस पर नियमित रूप से अमल सुनिश्चित करें।
बैठक में सवाल-जवाब की विशेष सभाएं
कार्यकारिणी समिति की दोनों बैठकों में सवाल-जवाब की सभाएं आयोजित की गईं।सुबह की सभा में सवालों के जवाब देने वालों में जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी, जमीअत उलमा कर्नाटक के अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती इफ्तिखार कासमी तथा जमीअत उलमा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी शामिल थे। उन्होंने विभिन्न सवालों के जवाब दिए।
जबकि रात की सभा में जमीअत उलमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना मुहम्मद सलमान बिजनौरी, महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी, सचिव मौलाना नियाज अहमद फारूकी तथा जमीअत उलमा उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष प्रोफेसर नोमान शाहजहांपुरी ने सवालों के जवाब दिए।
इससे पूर्व अपने महत्वपूर्ण संबोधन में दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद के कार्यक्षेत्र का विस्तार बहुत व्यापक हो गया है। इसके लिए युवाओं की क्षमताओं का भरपूर उपयोग करने की आवश्यकता है।
जमीअत उलमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना मुहम्मद सलमान बिजनौरी ने कहा कि उम्मत के इतिहास में बड़े शैक्षिक, धार्मिक और राष्ट्रीय कार्य सामान्यतः उन व्यक्तित्वों के माध्यम से संपन्न हुए हैं, जिनका प्रशिक्षण मशाइख और विद्वानों की देखरेख में हुआ था। धार्मिक संघर्ष और प्रयासों के लिए शैक्षिक योग्यता के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रशिक्षण, निष्ठा और दृढ़ता भी आवश्यक है।
नायब अमीर-ए-हिंद मौलाना मुफ्ती मुहम्मद सलमान मंसूरपुरी ने कहा कि संस्था की निरंतर प्रगति और स्थिरता के लिए जरूरी है कि युवा पीढ़ी और प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ़ाया जाए तथा उन्हें जिम्मेदारियां सौंपी जाएं।
जमीअत उलमा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी ने घोषणा-पत्र पढ़कर सुनाया।
पुस्तकों का विमोचन
इस अवसर पर जमीअत उलमा-ए-हिंद के पूर्व प्रमुख नेता हजरत मौलाना मुहम्मद इब्राहीम उलवी रहमतुल्लाह अलैह की जीवनी पर आधारित पुस्तक, विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक ‘सीरतुन्नबी ﷺ : 150 सवाल और जवाब’, मुफ्ती अशफाक काजी की ‘फैसले की दहलीज पर’, ‘काउंसलिंग सेंटर कैसे स्थापित करें?’ और ‘निकाह गाइड बुक’ सहित कई पुस्तकों का जमीअत के वरिष्ठ नेताओं के हाथों विमोचन किया गया।
*बैठक की व्यवस्था और प्रमुख प्रतिभागी*
बैठक का संचालन जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी और जमीअत उलमा-ए-हिंद के संगठन सचिव मौलाना मुहम्मद उमर कासमी ने संयुक्त रूप से किया।
जमीअत उलमा हरियाणा, पंजाब एवं हिमाचल प्रदेश के महासचिव मौलाना याह्या करीमी ने अध्यक्षता का प्रस्ताव पेश किया, जिसका समर्थन जमीअत उलमा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मौलाना आकिल साहब और जमीअत उलमा मणिपुर के अध्यक्ष मौलाना सईद अहमद साहब ने किया।
बैठक में मुफ्ती सैयद मुहम्मद सालेह हसनी, आमीन-ए-आम मजाहिर उलूम सहारनपुर; मुफ्ती राशिद आजमी, दारुल उलूम देवबंद; मुफ्ती महमूद साहब, बारडोली; मौलाना सिद्दीकुल्लाह चौधरी, अध्यक्ष जमीअत उलमा पश्चिम बंगाल; मौलाना हसन महमूद खेरवा (राजस्थान); मौलाना नदीम अहमद सिद्दीकी, अध्यक्ष जमीअत उलमा महाराष्ट्र; मुफ्ती इफ्तिखार अहमद कासमी, अध्यक्ष जमीअत उलमा कर्नाटक; मौलाना शम्सुद्दीन बिजली कासमी, महासचिव जमीअत उलमा कर्नाटक; मुफ्ती अशफाक काजी, मुंबई; मुफ्ती जावेद इकबाल किशनगंजी, अध्यक्ष जमीअत उलमा बिहार; मौलाना नाजिम, महासचिव जमीअत उलमा बिहार; हाजी मुहम्मद हारून, अध्यक्ष जमीअत उलमा मध्य प्रदेश; मौलाना अब्दुल कवी, सदस्य कार्यकारिणी समिति; मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री, महासचिव जमीअत उलमा राजस्थान; मौलाना मंसूर काशिफी, अध्यक्ष जमीअत उलमा तमिलनाडु; मौलाना साजिद फलाही; मौलाना इब्राहीम, अध्यक्ष जमीअत उलमा केरल; निजामुद्दीन, पूर्व विधायक एवं सचिव जमीअत उलमा तमिलनाडु; मौलाना हमीदुल्लाह मीर कश्मीरी; मुफ्ती अब्दुल्लाह मारूफी; उस्ताद दारुल उलूम देवबंद; मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक अमरोहवी, उस्ताद दारुल उलूम देवबंद; मौलाना अली हसन मजाहिरी, महासचिव जमीअत उलमा हरियाणा एवं संयुक्त पंजाब; मौलाना काजी अब्दुल माजिद निजामी, अध्यक्ष जमीअत उलमा आंध्र प्रदेश; मौलाना मीनुल हक अब्दुल्लाह उसामा कासमी, महासचिव जमीअत उलमा उत्तर प्रदेश; मौलाना अब्दुल कादिर असम, उपाध्यक्ष जमीअत उलमा असम; मौलाना फजलुल करीम, सचिव जमीअत उलमा असम; मौलाना अबू दर्दा मुअव्वज, मुंबई; मुफ्ती मेहदी हसन ऐनी तथा मौलाना अजीमुल्लाह सिद्दीकी, सचिव जमीअत उलमा-ए-हिंद सहित अनेक उलमा और पदाधिकारी उपस्थित रहे।
इन सभी ने अपने विचार व्यक्त किए, प्रस्ताव प्रस्तुत किए और उनका समर्थन किया।बैठक की व्यवस्थाओं और आयोजन को सफल बनाने में मेवात के मौलाना याह्या करीमी, मौलाना शेर मुहम्मद अमीनी, कारी असलम बडेडवी, मुफ्ती सलीम साकर्स, मास्टर कासिम महूं, मौलाना दिलशाद हिंगनपुर, मौलाना शेर मुहम्मद तावड़ू, मुफ्ती हाशिम तावड़ू, मुफ्ती अरशद बाटोक्स, मौलवी आरिफ नदवी, मौलवी अजहर जफर महूं, कारी साजिद करीमी, कारी जकरिया महूं और उनकी पूरी टीम ने बड़ी मेहनत और लगन से योगदान दिया।इसी प्रकार जमीअत उलमा दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद कासिम नूरी और उनकी टीम ने भी आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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