संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद मलबा हटाने के दौरान सामने आए करीब 20 फीट गहरे और लगभग 1.5 मीटर चौड़े कुएं को लेकर गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) ने वैज्ञानिक पुरातात्त्विक जांच और संरक्षण की मांग की है। संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि कुएं को फिलहाल संभावित पुरातात्त्विक अवशेष मानते हुए विशेषज्ञों की जांच पूरी होने तक इसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
निमराजे ने कहा कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर अभी कुएं को मौर्यकालीन या बौद्धकालीन घोषित करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। इसके लिए निर्माण शैली, सामग्री, आसपास की पुरातात्त्विक परतों और कुएं से प्राप्त संभावित अवशेषों का विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की विशेषज्ञ टीम से वैज्ञानिक निरीक्षण, नियंत्रित खुदाई और आवश्यक होने पर काल-निर्धारण कराने की मांग की।
उन्होंने कहा कि सहारनपुर क्षेत्र का प्राचीन इतिहास इस खोज को महत्वपूर्ण बनाता है। क्षेत्र का संबंध प्राचीन सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक स्थलों से रहा है। निकटवर्ती हरियाणा क्षेत्र में चनेती और सुघ जैसे बौद्ध एवं प्राचीन पुरास्थल तथा टोपरा से संबंधित अशोक स्तंभ इस पूरे भूभाग के पुरातात्त्विक महत्व को रेखांकित करते हैं। ऐसे में सहारनपुर में मिले कुएं का अध्ययन व्यापक सहारनपुर–सुघ–चनेती पुरातात्त्विक परिदृश्य के संदर्भ में किए जाने की जरूरत है।
संस्था ने कुएं को भरने, तोड़ने या उसके ऊपर निर्माण पर तत्काल रोक लगाने, आसपास भू-भौतिकीय (GPR) सर्वेक्षण कराने, पुराने नक्शों एवं राजस्व अभिलेखों की जांच, निर्माण सामग्री का वैज्ञानिक परीक्षण तथा कुएं से मिलने वाली मृद्भांड, सिक्के, धातु, अस्थि अथवा अन्य सामग्री का संरक्षण करने की मांग की है। साथ ही पुरातत्वविदों, इतिहासकारों, भू-वैज्ञानिकों और संरक्षण विशेषज्ञों की समिति गठित कर पूरे क्षेत्र का पुरातात्त्विक मानचित्र तैयार करने का सुझाव दिया गया है।
निमराजे ने कहा कि यदि वैज्ञानिक जांच में कुएं की प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व प्रमाणित होता है तो Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958 सहित लागू कानूनी प्रावधानों के तहत इसे संरक्षित पुरातात्त्विक स्थल या स्मारक घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं है। “इतिहास अनुमान या धार्मिक आग्रह से नहीं, बल्कि पुरातत्व, अभिलेख, वैज्ञानिक परीक्षण और प्रमाणों के आधार पर सामने आना चाहिए। यदि कुआं प्राचीन नहीं है तो जांच इसे स्पष्ट कर देगी और यदि प्राचीन है तो उसकी वास्तविक उम्र व ऐतिहासिक संदर्भ भी सामने आएगा।” उन्होंने कहा कि प्रशासन को इस मामले में पारदर्शी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए जांच करानी चाहिए।

