नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ़, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

वाघूर डैम के लिफ्ट इरिगेशन योजना में सैकड़ों करोड़ की लागत से बन रहे कृषि सिंचाई तालाबों की मजबूती बारिश पर निर्भर है। जमीन के नीचे तीन मीटर और जमीन के ऊपर करीब चार मीटर इस प्रकार से लगभग सात मीटर तक तीस लाख लीटर का जल भंडारण करने वाले तालाब के पानी का भार संभालने वाली मिट्टी की दीवारें कुदरत के भरोसे छोड़ दी गई है। दीवारों को मजबूती के लिए पत्थर सीमेंट से बाहरी आवरण देने का कोई प्रावधान टेंडर और वर्क ऑर्डर में नहीं है। कुछ दिन पहले वाकी बुद्रूक में पर्वता बाई तेली के खेत में बने तालाब की दीवार पहली बारिश में बह गई।
किसानों के साथ बातचीत में बताया कि तालाब के चारों तरफ बनी मिट्टी की दीवार को मजबूती के लिए भरपूर पानी छिड़ककर रोड रोलर से दबाना जाना चाहिए था जो नहीं किया गया। सूचना अधिकार के जानकारों से पता चला वर्क ऑर्डर में सीमेंट कॉन्क्रीट के प्रयोग का कोई प्रावधान नहीं बल्की बारिश के पानी से दब दबकर साल दर साल तालाब की दीवारे अटूट बनेगी क्या ? इसी लिए निर्माण कंपनी GVPR ने अपनी जवाबदेही मानसून पर थोपकर मशीनरी इंधन मानव संसाधन की बचत करी है।
अगर हां तो वाघूर डैम विभाग को प्रोजेक्ट से जुड़ा बचत खाता सार्वजनिक करना चाहिए। 3800 तालाबों के निर्माण के लिए अलग अलग टीम में बंटे इरिगेशन के अफसरो को GVPR पर नियंत्रण का कोई अधिकार नहीं है। तेज़ धूप से तालाब की दीवारे उखड़ेगी और मूसलाधार बारिश उन्हें बहा ले जाएगी। इस प्रोजेक्ट का कोई शाश्वत मुस्तकबिल नहीं है। लेकिन इस योजना से जुड़े सैकड़ों लाभधारक और उनकी नस्लों का भविष्य सुनहरा है।

