गणेश मौर्या, ब्यूरो चीफ, अंबेडकर नगर (यूपी), NIT:
अंबेडकर नगर जिले का परिवहन कार्यालय पूरी तरह से दलालों के कब्जे में नजर आ रहा है। कार्यालय में सौरव, सूरज, राघवेंद्र, पप्पू, मनोज, सुशील यादव और राजेंद्र माली जैसे दलाल खुलेआम काम करते दिखाई देते हैं। आरोप है कि इन दलालों का संरक्षण स्वयं एआरटीओ अधिकारी सत्येंद्र सिंह यादव द्वारा किया जा रहा है।

भाजपा सरकार द्वारा “ना भ्रष्टाचार, ना गुंडाराज” का नारा दिया जाता है, लेकिन अंबेडकर नगर में एआरटीओ सत्येंद्र सिंह यादव इस नारे पर स्वयं कालिख पोतते नजर आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जिले के जिम्मेदार अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी मूकदर्शक बने हुए हैं। आम जनता का खुलेआम शोषण किया जा रहा है और भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच चुका है।

पूर्व में परिवहन विभाग में कार्यरत स्मार्ट चिप कंपनी का टेंडर समाप्त हो चुका है और नई कंपनी ने कार्यभार भी संभाल लिया है। इसके बावजूद वाहन बायोमेट्रिक एवं फोटो खींचने जैसे कार्य पुराने कर्मचारियों—प्रवेश श्रीवास्तव, प्रवीण मिश्रा और सुभाष वर्मा—से ही कराए जा रहे हैं। आरोप है कि यह सब निजी लाभ के लिए किया जा रहा है।

अकबरपुर परिवहन कार्यालय में स्थिति यह है कि हर कमरे और केबिन के बाहर और अंदर बाहरी लोग कार्य करते दिखाई देते हैं। किसी भी कमरे में एक भी कुर्सी खाली नहीं मिलती। परिवहन विभाग के कर्मचारी, ठेका कर्मचारी और दलाल मिलकर पूरे सिस्टम को चला रहे हैं। आरसी बनवाने से लेकर कैश जमा करने तक का काम दलालों के माध्यम से ही किया जा रहा है।

कार्यालय में आने वाले लोगों का कहना है कि बिना एजेंट (दलाल) के कोई भी काम नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति सीधे लाइसेंस बनवाने जाए तो उसका काम होना लगभग असंभव है। कर्मचारियों की कुर्सियों पर बैठे दलाल अधिक पैसे लेकर लाइसेंस बनवाने का ठेका ले लेते हैं।
मीडिया टीम द्वारा जब इन गतिविधियों को कैमरे में कैद किया गया तो दलाल फाइलों पर कोर्ट लगाते नजर आए। कैमरा देखते ही वे पीछे के रास्तों से भाग खड़े हुए।
दलालों ने हर काम के लिए अलग-अलग रेट तय कर रखे हैं। एलएमवी लाइसेंस की सरकारी फीस से कई गुना अधिक राशि वसूली जाती है। इसी प्रकार रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (आरसी) के लिए भी तय रकम से अधिक पैसे लिए जाते हैं।
परिवहन कार्यालय में अनाधिकृत प्राइवेट लोग फाइलें इधर-उधर पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं, जो साफ तौर पर नियमों का उल्लंघन है। यह पूरा मामला परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
