जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:
अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने के लिए एक ऐसी कहानी की संरचना की गई जो अमानवीय होने के साथ-साथ अत्यंत गंदी और भद्दी स्वरूप मे थाने में प्रस्तुत की गई और पुलिस ने भी उसी प्रकार उस पर मोहर लगाते हुए एक महिला को भारतीय दंड संहिता की धारा 294/323/ 34/120बी/389/120बी के तहत मुकदमा कायम करके उसे जेल पहुंचवा दिया। वह 22 महीने जेल में रही मगर जब उस मुकदमे की पैरवी राजधानी के क्रिमिनल विशेषज्ञ वरिष्ठ एडवोकेट मुईन कुरैशी ने सिलसिले बार इसका परीक्षण करके अदालत में दलील रखी तो फरियादी और पुलिस ने जो कहानी बनाई थी उस पर से पर्दा उठ गया और आरोपी महिला को बा इज्जत बरी किया गया। यह मामला थाना शाहजहानाबाद क्षेत्र अंतर्गत का है। जहां पर एक फरियादी ने एक महिला को झूठा फंसाने के लिये टीवी सीरियल की तर्ज पर एक ऐसी कहानी
बनाई जिसमे उसका कहना था कि
एक महिला जिसका परिवर्तित
नाम रानी है उसने उसे कोल्ड
ड्रिंक में नशीली दवा पिलाकर
उसका वीडियो बनाया और वह
उसे ब्लैकमेल करने के लिए
अपने एक साथी के साथ परेशान
करती रही। घटना का स्वरूप
बहुत बड़ा है जिसमें कहानी को मनोहरलाल पाटीदार ने बा इज्जत
बड़ा करने के लिए अनेक आपत्तिजनक सामग्री का भी उल्लेख किया गया है और पुलिस ने इस आधार पर उपरोक्त धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया और आरोपी महिला परिवर्तित नाम रानी को गिरफ्तार करके जेल पहुंचा दिया जहां पर वह महिला 22 महीनों तक जेल में रही। इस प्रकरण जब द्वितीय अपर न्यायाधीश मनोहर लाल पाटीदार के न्यायालय में प्रस्तुत हुआ और इस मामले की पैरवी आरोपी की ओर से एडवोकेट मुईन कुरैशी ने सिलसिले बार की तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। फरियादी के बने हुए गवाह भी सच्चाई के आगे नही टिक सके और उनके बयानो में विरोधाभास रहा और कुछ गवाहों की अंतरात्मा जाग गई और उन्होंने न्यायालय के समक्ष फरियादी के कथन का समर्थन नहीं किया एडवोकेट कुरैशी के जिरह के आगे वह टूट गए। 22 महीने जेल में रहने वाली परिवर्तित नाम रानी को न्यायाधीश
बरीकर दिया। फरियादी और पुलिस की मिली भगत से जो कहानी मनगढ़ंत बनाकर पेश की उसमे जिन धाराओं का उल्लेख किया गया वह श्रेणी मे नही आती यह दलील दमदारी के साथ एडवोकेट मुईन कुरैशी ने न्यायालय के समक्ष रखी और उसके उदाहरण उन्होंन े देश की विभिन्न हाईकोर्ट इसमें दिल्ली कर्नाटक हरियाणा के अलावा सुप्रीम कोर्ट का भी उल्लेख किया। फरियादी ने जिन मोबाइलों का आधार बनाकर उनका उपयोग किया उनकी भी विधिवत फॉरेंसिक जांच और उस पर एडवोकेट कुरैशी के सवाल को न्यायालय ने सा सम्मान स्वीकार किया। फरियादी और उसके ग्रुप ने जो विवरण एफ आई आर में दर्ज कराया था उसको मूल स्वरूप में बताना संभव नही है। मगर उस बनाई हुई कहानी की परत दर परत कलई खुल गई और 22 महीन के बाद एक महिला को न्यायालय से
इंसाफ मिल सका।

