बाल मन को समझने की जरूरत पर जोर, ‘गली बचपन की’ राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे देशभर के रचनाकार | New India TimesOplus_131072

अबरार अहमद खान, इंदौर/भोपाल (मप्र), NIT:

बाल मन को समझने की जरूरत पर जोर, ‘गली बचपन की’ राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे देशभर के रचनाकार | New India Times

बच्चों तक वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रभावी ढंग से पहुँचाने पर गंभीर विचार करने की आवश्यकता है। साथ ही रचनात्मकता के साथ विद्यालयों में स्मारिका प्रकाशन को बढ़ावा देना भी जरूरी है। वैश्वीकरण के दौर में भारतीय बाल साहित्य की वैश्विक पहचान और अनुवाद की संभावनाएँ तेजी से बढ़ी हैं, जहाँ अनुवाद एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य कर रहा है।
वक्ताओं ने कहा कि बाजारीकरण के बीच मानवीय मूल्यों की रक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। यदि हमें बच्चों के लिए लिखना है तो उनके जैसा सोचना, पढ़ना और उनकी मानसिकता को समझना होगा। बाल मन को पढ़ना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
ये विचार साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश द्वारा स्व. कृष्ण कुमार अष्ठाना की स्मृति में ‘गली बचपन की’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी के दूसरे दिन विभिन्न सत्रों में व्यक्त किए गए। यह आयोजन भोपाल के श्यामला हिल्स स्थित एनआईटीटीटीआर परिसर में सम्पन्न हुआ, जिसमें देशभर से बाल साहित्यकार, शोधार्थी और साहित्य प्रेमी शामिल हुए।
अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे की उपस्थिति में कार्यक्रम का संयोजन ‘देवपुत्र’ के संपादक गोपाल माहेश्वरी ने किया। समापन सत्र में डॉ. दवे के भावपूर्ण उद्बोधन से कई रचनाकार भावुक हो उठे। उन्होंने डॉ. जीवन रजक के संबोधन और सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया। आयोजन का समन्वय डॉ. मीनू पांडे ‘नयन’ ने किया।
विभिन्न विषयों पर हुआ मंथन
संगोष्ठी में ‘बाल साहित्य में बदलती परिवार व्यवस्था, शिक्षक एवं समाज की भूमिका’, ‘कल्पना एवं यथार्थ’, ‘डिजिटल युग में पठन की चुनौती’, ‘सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव’ जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।
भाषाविद् डॉ. पूजा अलापुरिया ‘हेमाक्ष’ ने कहा कि आज बच्चों की सोच बदल चुकी है और लेखकों को भी स्वयं को अपडेट करना होगा। बच्चों से संवाद स्थापित किए बिना उनके लिए सार्थक लेखन संभव नहीं है।
71 वक्ताओं ने रखे विचार
दो दिनों में कुल 11 सत्र आयोजित हुए, जिनमें 10 प्रमुख विषयों पर चर्चा हुई। 51 वक्ताओं ने अपने विचार प्रस्तुत किए, जबकि अध्यक्षों और बीज वक्ताओं सहित कुल 71 प्रतिभागियों ने मंचीय अभिव्यक्ति दी।
शोधार्थियों के लिए विशेष सत्र
बाल साहित्य पर शोध कर रहे पीएचडी शोधार्थियों के लिए विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसमें नए शोध विषयों और संभावनाओं पर चर्चा की गई।
20 पुस्तकों का विमोचन
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न राज्यों के रचनाकारों की 20 पुस्तकों और एक मासिक पत्रिका का लोकार्पण भी किया गया, जो आयोजन की विशेष उपलब्धि रही।

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