Edited by Faraz Ansari, NIT:
रुख़सार परवीन, बहराइच (यूपी)

ज़ख़्म दिया ऐसा कि भरता ही नहीं,
आपकी यादों का सिलसिला थमता ही नहीं।
हँसता हुआ चेहरा तो दुनिया के लिए है,
दिल है कि ग़मों से उबरता ही नहीं।
हर शब आपकी याद और गहरी हो जाती है,
फिर भी आप सामने नज़र आते क्यों नहीं।
अश्क़ों का ये सैलाब ठहरता ही नहीं,
एक आप हैं—जिन्हें इसका एहसास होता ही नहीं।
क्या हमारी याद आपको आती नहीं,
हमारी फ़रियाद आप तक पहुँचती क्यों नहीं।
अरसा गुज़र गया आपकी आवाज़ सुने हुए,
ख़ामोश यूँ हो गए—कुछ कहते क्यों नहीं।
रो लूँ मैं लिपटकर आपसे जी भर के,
ये वक़्त बेरहम है—लौटकर आता क्यों नहीं।
काश आप अब भी होते हमारे दरमियाँ,
ये अरमाँ दिल से निकलता क्यों नहीं।
कैसे लाऊँ आपको मैं वापस, पापा,
ऐ ख़ुदा—तू है तो मेरी सुनता क्यों नहीं।
मुझे काँटा भी चुभे तो दर्द आपको होता था,
आज मैं तड़प रही हूँ—आपको खबर होती क्यों नहीं।
क्या ख़ता हुई जो यूँ रूठ गए हमसे,
दिल रेज़ा-रेज़ा है—आपको दिखता क्यों नहीं।
लफ़्ज़ नहीं मिलते कि बयाँ करूँ ये दर्द,
आपका जाना—ज़िंदगी का स्याह पन्ना है, पलटता क्यों नहीं।
दुनिया का हर ग़म छोटा है आपके ग़म के आगे,
हमारे ग़मों के हमदम आप बनते क्यों नहीं।
काश कोई कीमत होती आपको वापस लाने की, पापा,
‘रुख़’ की जान भी हाज़िर है—पर कुछ बदलता क्यों नहीं।।
