मोहम्मद इसहाक मदनी, ब्यूरो चीफ, मैहर (मप्र), NIT:
रीवा आए नए कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने पदभार संभालते ही वर्षों से जमे अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर सख्ती दिखाना शुरू कर दिया। ऐसा प्रतीत होता है मानो उन्हें रीवा की प्रशासनिक सुस्ती की पहले से जानकारी थी। जब उन्होंने वर्षों से फाइलों में लंबित मामलों को देखा, तो संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा। लेकिन कलेक्टर साहब के सवाल अधिकारियों और कर्मचारियों को रास नहीं आए। वैसे भी यहां के कुछ कर्मचारियों को यह पसंद नहीं कि उनसे कोई जवाब-तलब करे या काम के प्रति जवाबदेही तय करे।
यदि गलती से भी कोई वरिष्ठ अधिकारी कुछ कह दे, तो कर्मचारी सीधे अपने प्रभावशाली आकाओं के पास पहुंच जाते हैं और फिर शुरू हो जाती है संबंधित अधिकारी के खिलाफ साजिश। नए कलेक्टर श्री सूर्यवंशी के साथ भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। कुछ कर्मचारी उन पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ज्ञापन और हड़ताल की शुरुआत भी हो चुकी है।
लेकिन इन सबके बीच रीवा के सरकारी कर्मचारियों को विरोध के बजाय आत्ममंथन करने की जरूरत है। उन्हें गंभीरता से सोचना चाहिए कि आखिर उनकी छवि इतनी खराब क्यों हो चुकी है। जिस दिन उनका पद और अधिकार समाप्त हो जाएगा, रिटायरमेंट के बाद वे समाज में किस पहचान के साथ लोगों के बीच उठ-बैठ पाएंगे।
हाल ही में जब कर्मचारियों ने कमिश्नर से कलेक्टर श्री सूर्यवंशी की शिकायत की, तो सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग कलेक्टर के समर्थन में खड़े दिखाई दिए। आम जनता ने भी उनके सख्त कदमों का स्वागत किया। सोशल मीडिया पर लोगों ने खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं।
मैं कलेक्टर के विरोध में उतरे कर्मचारियों से अनुरोध करना चाहता हूं कि वे सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं को जरूर पढ़ें। लगभग 99 प्रतिशत प्रतिक्रियाएं कर्मचारियों के विरोध में हैं। लोगों ने अपने-अपने तरीके से नाराजगी जाहिर की है और कलेक्टर द्वारा उठाए जा रहे कदमों का समर्थन किया है। कई लोगों ने कर्मचारियों की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणियां भी की हैं।
इन प्रतिक्रियाओं से साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम जनता की नजर में सरकारी कर्मचारियों की छवि कितनी खराब हो चुकी है। यदि नौकरी, कर्तव्यनिष्ठा और जनता के प्रति जवाबदेही को नजरअंदाज भी कर दिया जाए, तब भी कर्मचारियों को यह जरूर सोचना चाहिए कि समाज में उनकी साख किस स्तर तक गिर चुकी है।
जब वे रिटायर होंगे और पद का प्रभाव समाप्त हो जाएगा, तब एक सामान्य नागरिक के रूप में समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीना कितना कठिन होगा — इस पर विचार करना आवश्यक है। यदि इसके बावजूद भी कुछ कर्मचारी आत्ममंथन के बजाय विरोध का रास्ता चुन रहे हैं, तो यह समझा जा सकता है कि उनमें शर्म और जिम्मेदारी की भावना समाप्त होती जा रही है।

