जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में मोदी सरकार से गिग वर्कर्स (जैसे डिलीवरी पार्टनर, कैब ड्राइवर आदि) की समस्याओं पर कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे थे। ये सवाल मार्च 2026 के आसपास लोकसभा में उठाए गए थे, और सरकार ने इन पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया।
राहुल गांधी ने ये मुख्य सवाल पूछे थे:
क्या गिग वर्कर्स को न्यूनतम मजदूरी मिलेगी?
→ कोई जवाब नहीं
बीमा योजनाओं में उनके क्लेम (फाइल किए गए, स्वीकृत हुए, अस्वीकृत हुए) का डेटा क्या है?
→ कोई जवाब नहीं
गिग वर्कर्स के एक्सीडेंट और मौतों की संख्या कितनी है?
→ कोई जवाब नहीं
सरकार के पास ID ब्लॉकिंग, जाति-आधारित भेदभाव, और महिला वर्कर्स की समस्याओं को हल करने की कोई योजना है?
→ कोई जवाब नहीं
राहुल गांधी ने कहा कि सरकार की इस खामोशी से साफ पता चलता है कि गिग वर्कर्स की मेहनत, उनकी सुरक्षा, और उनका सम्मान मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है।
कांग्रेस पार्टी ने इन मुद्दों को लगातार उठाया है:
राहुल गांधी ने संसद में ‘जन संसद’ के जरिए गिग वर्कर्स से मुलाकात की और उनकी समस्याएं सुनीं।
ये समस्याएं हैं: एल्गोरिदम से शोषण, कम/अनिश्चित कमाई, सामाजिक सुरक्षा की कमी, मनमानी तरीके से ID ब्लॉक करना, जाति/लिंग आधारित भेदभाव आदि।
कांग्रेस शासित राज्यों (जैसे कर्नाटक) में गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा, निष्पक्ष अनुबंध, और पारदर्शिता वाली व्यवस्थाएं लागू की गई हैं या प्रस्तावित हैं।
कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार भले इन वर्कर्स को नजरअंदाज करे, लेकिन कांग्रेस उनकी आवाज बुलंद करती रहेगी और जहां उनकी सरकारें हैं, वहां उनके हित में काम जारी रहेगा।
गिग इकॉनमी में लाखों लोग काम करते हैं (जैसे Zomato, Swiggy, Uber आदि पर), लेकिन उन्हें अभी भी मजबूत कानूनी सुरक्षा और सम्मानजनक कामकाजी हालात नहीं मिल पाए हैं। अंतरराष्ट्रीय गिग वर्कर अधिकार (International Gig Worker Rights) एक वैश्विक मुद्दा है, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (जैसे Uber, DoorDash, Zomato, Upwork आदि) पर काम करने वाले गिग वर्कर्स की सुरक्षा, न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक कामकाजी हालात से जुड़ा है।
दुनिया भर में गिग इकॉनमी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अधिकांश वर्कर्स को “स्वतंत्र ठेकेदार” (independent contractors) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे उन्हें कर्मचारी जैसी सुरक्षा (minimum wage, health insurance, paid leave, accident coverage आदि) नहीं मिल पाती।
वैश्विक स्तर पर मुख्य विकास और प्रयास
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO): ILO ने 2025 में प्लेटफॉर्म वर्क पर पहली बार बाइंडिंग (बाध्यकारी) अंतरराष्ट्रीय मानकों को आगे बढ़ाया। 2025-2026 में ILO सम्मेलन में एक नया Convention और Recommendation तैयार किया जा रहा है, जो गिग वर्कर्स के लिए वैश्विक नियम बनाएगा।
मुख्य सिफारिशें: प्लेटफॉर्म वर्कर्स को कर्मचारी मानना (presumption of employment), जब तक कंपनी साबित न करे कि वे वाकई स्वतंत्र हैं।
न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा (बीमा, पेंशन, स्वास्थ्य), एल्गोरिदम की पारदर्शिता (algorithmic management), एक्सीडेंट/मौत पर सुरक्षा, और ब्लैकबॉक्स एल्गोरिदम से शोषण रोकना।
Human Rights Watch और अन्य संगठन मजबूत नियमों की मांग कर रहे हैं, ताकि कंपनियां जोखिम वर्कर्स पर न डालें।
2026 में यह संधि अंतिम रूप ले सकती है, जो सदस्य देशों के लिए बाध्यकारी होगी।
यूरोपीय संघ (EU) का प्लेटफॉर्म वर्क डायरेक्टिव: 2024 में अपनाया गया और दिसंबर 2024 से प्रभावी। सदस्य देशों को 2026 तक इसे अपनी कानून में लागू करना है।
मुख्य प्रावधान:
Employment presumption — अगर प्लेटफॉर्म वर्कर्स के काम, वेतन, शेड्यूल या मूल्यांकन पर नियंत्रण रखता है, तो उन्हें कर्मचारी माना जाएगा।
एल्गोरिदम से फैसले (जैसे ID ब्लॉकिंग) पारदर्शी होंगे; वर्कर्स को एक्सप्लेनेशन और अपील का अधिकार।
ऑटोमेटेड सिस्टम से फायरिंग नहीं हो सकती।
न्यूनतम सुरक्षा, ट्रेनिंग, और डेटा प्रोटेक्शन।
यह दुनिया का सबसे मजबूत क्षेत्रीय कानून है, जो लाखों गिग वर्कर्स (2025 में अनुमानित 4.3 करोड़) को लाभ देगा।
अन्य देशों/क्षेत्रों में स्थिति:
यूके: Uber ड्राइवर्स को कर्मचारी अधिकार (minimum wage, holiday pay, pension) मिल चुके हैं (2021 सुप्रीम कोर्ट फैसला)।
अमेरिका: कैलिफोर्निया में Proposition 22 के बावजूद कई मुकदमे; कई राज्य misclassification पर सख्ती कर रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया: मल्टी-फैक्टर टेस्ट से वर्कर्स को सुरक्षा देने की कोशिश।
विकासशील देश: ग्लोबल साउथ में (भारत, अफ्रीका आदि) misclassification ज्यादा; ILO मानक इन देशों के लिए गेम-चेंजर हो सकते हैं।
मुख्य चुनौतियां और मांगें
Misclassification: कंपनियां वर्कर्स को स्वतंत्र ठेकेदार बताकर जिम्मेदारियां टालती हैं।
एल्गोरिदम शोषण: पारदर्शिता की कमी, मनमानी रेटिंग/ID ब्लॉकिंग।
सामाजिक सुरक्षा की कमी: एक्सीडेंट, बीमारी, बेरोजगारी पर कोई कवर नहीं।
न्यूनतम मजदूरी और सम्मान: कई वर्कर्स गरीबी रेखा से नीचे कमाते हैं।
वैश्विक संगठन (ITUC, HRW आदि) मांग करते हैं कि गिग वर्कर्स को सभी मूल अधिकार मिलें, जैसे collective bargaining और सुरक्षित काम।
भारत में भी ये मुद्दे राहुल गांधी जैसे नेताओं द्वारा उठाए जा रहे हैं, और ILO के वैश्विक मानक भारत जैसे देशों को मजबूत कानून बनाने में मदद कर सकते हैं। भारत में गिग वर्कर्स (जैसे Zomato, Swiggy, Uber, Ola, Blinkit आदि पर काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर, कैब ड्राइवर, फ्रीलांसर) के लिए कानूनी ढांचा मुख्य रूप से चार नए श्रम संहिताओं (Labour Codes) पर आधारित है, जिनमें से Code on Social Security, 2020 सबसे महत्वपूर्ण है। यह पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को कानूनी मान्यता देता है।
केंद्र सरकार का कानून (राष्ट्रीय स्तर पर)
Code on Social Security, 2020 नवंबर 2025 में अधिसूचित (नोटिफाई) हुआ और प्रभावी हुआ।
गिग वर्कर्स को पहली बार कानूनी पहचान मिली: वे “स्वतंत्र ठेकेदार” नहीं बल्कि एक अलग श्रेणी में आते हैं।
मुख्य प्रावधान (2026 के ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, अप्रैल 2026 से लागू होने की संभावना):
सामाजिक सुरक्षा (Social Security): जीवन बीमा, अक्षमता कवर, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ, पेंशन आदि।
पात्रता के लिए नियम:
एक एग्रीगेटर (प्लेटफॉर्म) के साथ कम से कम 90 दिन काम (एक वित्तीय वर्ष में)।
कई प्लेटफॉर्म्स पर कुल 120 दिन।
आधार-लिंक्ड रजिस्ट्रेशन: 16+ उम्र के वर्कर्स को ई-श्रम पोर्टल या डिजिटल आईडी से रजिस्टर करना होगा।
एग्रीगेटर्स की जिम्मेदारी: प्लेटफॉर्म्स को अपने टर्नओवर का 1-2% (अधिकतम 5% पेमेंट्स का) एक नेशनल सोशल सिक्योरिटी फंड में जमा करना होगा।
न्यूनतम मजदूरी, व्यावसायिक सुरक्षा (accident insurance), स्वास्थ्य सुरक्षा आदि का विस्तार।
ड्राफ्ट नियम दिसंबर 2025 में जारी किए गए, हितधारकों से फीडबैक मांगा गया। 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य।
सीमाएं: न्यूनतम मजदूरी और अन्य मजदूर अधिकार (जैसे छुट्टी, यूनियन बनाने का अधिकार) पूरी तरह लागू नहीं हुए हैं। कई विशेषज्ञ कहते हैं कि क्रियान्वयन (implementation) अभी कमजोर है, और फंड पर्याप्त नहीं हो सकता।
राज्य स्तर पर कानून (कुछ राज्यों में आगे बढ़ा)
केंद्र के कानून के अलावा कुछ राज्य अलग से मजबूत कानून बना रहे हैं:
कर्नाटक:
Karnataka Platform Based Gig Workers (Social Security and Welfare) Act, 2025 (2025 में अध्यादेश से शुरू, बाद में कानून)।
वेलफेयर फी: प्लेटफॉर्म्स को गिग वर्कर्स को पेमेंट का 1% (या अधिकतम 5%) वेलफेयर फंड में जमा करना अनिवार्य (फरवरी 2026 से नोटिफाई)।
वेलफेयर बोर्ड बनाया गया, रजिस्ट्रेशन, शिकायत निवारण, और लाभ (बीमा, स्वास्थ्य आदि)।
अप्रैल 2026 से पूरी तरह लागू होने की उम्मीद।
राजस्थान: 2023 में Platform-Based Gig Workers (Registration and Welfare) Act पारित, पंजीकरण और कल्याण पर फोकस।
बिहार, झारखंड, तेलंगाना: ड्राफ्ट या कानून पास/प्रस्तावित, सामाजिक सुरक्षा और पारदर्शिता पर।
अन्य राज्य (जैसे मध्य प्रदेश) अभी केंद्र के इंतजार में हैं।
मुख्य चुनौतियां (2026 की स्थिति में)
क्रियान्वयन धीमा: फंड, रजिस्ट्रेशन पोर्टल, और लाभ वितरण अभी पूरी तरह नहीं शुरू।
एल्गोरिदम शोषण: ID ब्लॉकिंग, रेटिंग, पेमेंट पारदर्शिता पर मजबूत नियम नहीं।
न्यूनतम मजदूरी: अभी गारंटीड नहीं, सिर्फ सामाजिक सुरक्षा पर फोकस।
वर्कर्स की मांग: हड़तालें (जैसे 2025-26 में) हो रही हैं, जहां न्यूनतम कमाई, एक्सीडेंट कवर, और सम्मानजनक हालात की मांग है।
संख्या: 2024-25 में 1 करोड़+, 2030 तक 2.35 करोड़ होने का अनुमान।
कुल मिलाकर, 2026 में भारत में गिग वर्कर्स के लिए कानून प्रगति पर है (पहली बार मान्यता और फंड), लेकिन पूर्ण सुरक्षा (जैसे यूरोप में) अभी दूर है। केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर क्रियान्वयन तेज होने की जरूरत है।

