जमशेद आलम/इरशाद आलम, परासिया/छिंदवाड़ा (मप्र), NIT:
छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया है, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी राहुल डोंगरे के न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है।
वर्ष 2020 में परासिया पुलिस ने अवैध शराब परिवहन के आरोप में मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत मामला दर्ज किया था।
इस मामले में रंजीत डेहरिया (पिता पूरनलाल, उम्र 34 वर्ष) और संतोष डेहरिया (पिता पूरनलाल, उम्र 30 वर्ष), दोनों निवासी मैग्जीन लाइन, परासिया, को आरोपी बनाया गया था।
पुलिस ने आरोप लगाया था कि दोनों आरोपी स्कूटी जुपिटर पर कुल 54 लीटर अवैध शराब का परिवहन कर रहे थे, जिसमें सामने 22-22 लीटर और स्कूटी की डिक्की में 15 लीटर की कुप्पी/केन रखी हुई थी।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह राजपूत ने स्वीकार किया कि स्कूटी की डिक्की में 15 लीटर की केन रखना संभव नहीं है, जिससे पुलिस की पूरी कहानी संदिग्ध साबित हुई।
न्यायालय ने पूरे मामले को फर्जी मानते हुए तल्ख टिप्पणी की कि, “सब कुछ पता चलने के बाद न्यायालय मूक दर्शक नहीं रह सकता।”
अंततः कोर्ट ने दोनों आरोपियों रंजीत और संतोष डेहरिया को बरी कर दिया। झूठे केस के कारण संतोष डेहरिया को 51 दिन और रंजीत डेहरिया को 41 दिन जेल में रहना पड़ा।
कोर्ट ने तत्कालीन थाना प्रभारी सुमेर सिंह जगेत और जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह राजपूत के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 166, 167, 193, 196, 197, 198, 199, 200, 209 और 219 के तहत एफआईआर दर्ज करने के आदेश कोतवाली थाना प्रभारी को दिए हैं।
यह फैसला पुलिस द्वारा फर्जी केस दर्ज करने और निर्दोष लोगों को परेशान करने के खिलाफ न्यायालय की सख्ती का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।

