महाराष्ट्र हज कमेटी के CEO बने IAS मनोज जाधव, कानूनन वैध लेकिन सामाजिक स्तर पर उठा विवाद | New India Times

जमशेद आलम, मुंबई (महाराष्ट्र), NIT:

महाराष्ट्र सरकार ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी मनोज जाधव को महाराष्ट्र राज्य हज कमेटी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया है। वे इस पद पर शेख इब्राहिम शेख असलम का स्थान ले रहे हैं। यह नियुक्ति महाराष्ट्र सरकार द्वारा की गई है, जिसका नेतृत्व वर्तमान में महायुति गठबंधन (जिसमें भाजपा शामिल है) कर रहा है।

राज्य हज कमेटी का मुख्य कार्य हज यात्रा से जुड़ी व्यवस्थाएं करना होता है, जिसमें हज आवेदन प्रक्रिया, तीर्थयात्रियों का प्रशिक्षण, यात्रा प्रबंधन और हाजियों को सहायता प्रदान करना शामिल है। CEO का पद पूर्णतः प्रशासनिक होता है और कमेटी के दैनिक कार्यों के संचालन की जिम्मेदारी उसी की होती है।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि राज्य हज कमेटी के CEO की नियुक्ति राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र है, न कि केंद्रीय हज कमेटी का। केंद्रीय हज कमेटी (जो अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के अधीन है) का दायित्व राष्ट्रीय स्तर पर हज से संबंधित व्यवस्थाएं करना होता है, जैसे हज कोटा आवंटन और सऊदी अरब सरकार से समन्वय।

कानून क्या कहता है?

हज कमेटी अधिनियम, 2002 के अनुसार—
धारा 20 के तहत राज्य हज कमेटी का अध्यक्ष (चेयरपर्सन) अनिवार्य रूप से मुस्लिम होता है।

धारा 25 के अनुसार CEO की नियुक्ति राज्य सरकार करती है और यह कहा गया है कि अधिकारी “अधिमानतः मुस्लिम” होना चाहिए, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। यानी, गैर-मुस्लिम अधिकारी की नियुक्ति कानूनन वैध है।

देशभर में आमतौर पर राज्य हज कमेटियों के CEO मुस्लिम ही रहे हैं, लेकिन महाराष्ट्र में यह पहला अवसर है जब किसी गैर-मुस्लिम IAS अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसी कारण इस फैसले को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में असंतोष और विरोध देखने को मिला है। समाजवादी पार्टी के नेता यूसुफ अब्राहनी सहित कुछ नेताओं ने इसे धार्मिक भावनाओं के खिलाफ बताया है।

आलोचकों का कहना है कि हज एक धार्मिक विषय है, इसलिए इस पद पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए जिसे धार्मिक परंपराओं और हज से जुड़ी बारीकियों की गहरी समझ हो।

हालांकि, यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही होगा कि यह निर्णय केंद्रीय हज कमेटी की भूमिका या किसी राजनीतिक “चाटुकारिता” का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से महाराष्ट्र राज्य सरकार का प्रशासनिक निर्णय है। सरकार की ओर से इसे प्रशासनिक दक्षता के आधार पर लिया गया कदम बताया जा रहा है।

निष्कर्ष

यह नियुक्ति कानूनी रूप से पूरी तरह वैध है, लेकिन सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से विवादास्पद बनी हुई है। यदि भविष्य में राज्य सरकार या अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की ओर से कोई नया स्पष्टीकरण या संशोधन आता है, तो स्थिति में बदलाव संभव है।

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