अशफ़ाक़ क़ायमख़ानी, ब्यूरो चीफ, जयपुर (राजस्थान), NIT:

अधीकांश प्रभावशाली कांग्रेस नेताओं की साजिश व उनके स्वार्थ के चलते मुस्लिम समुदाय के बड़े तबके को साथ लेकर आजादी के बाद से चुनावी राजनीति की शुरुआत से लेकर आजतक पहले जनसंघ व फिर भाजपा को राजनीतिक तौर पर अछूत मानकर उसको छोड़कर पहले कांग्रेस फिर कांग्रेस सहित अन्य कथित सेक्युलर दलों के पक्ष मे मतदान करने का जेहन बनाया। जिसका परिणाम आज यह आया है कि भाजपा तो देश मे अछूत राजनीतिक दल नहीं बन पाया लेकिन मुस्लिम समुदाय को भाजपा ने राजनीतिक तौर पर अछूत बनाने में काफी हद तक सफलता पा ली है।
हालांकि मुस्लिम उम्मीदवार भाजपा से आने पर कुछेक जगह मुस्लिम मतदाता उसके पक्ष में मतदान कर दिया करते थे लेकिन अन्य जगह मुस्लिम मतदाता अन्य भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान नहीं करने के साथ साथ यह भी बढ़-चढ़कर दर्शाते थे कि वो मानो भाजपा को हराने का ठेका उन्होंने ही ले रखा है जबकि कांग्रेस व अन्य कथित सेक्यूलर दलों ने पक्ष में मतदान करने के बदले में वो दल चिकनी चुपड़ी बातें ही करते रहे। उन्होंने अपनी सत्ता काल में मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक तरक्की के लिये केवल मृगमरीचिका की तरह पाॅलिसी बनाने का दिखावा किया। कथित सेक्यूलर दलों ने मुस्लिम समुदाय के शोला ब्यानी करने वाले धार्मिक लीडर व कमजोर से कमजोर कम पढ़े लिखे लोगों को राजनीतिक तौर पर आगे लाने का दिखावा किया। यहां तक कि माफियाओं को भी आगे लाये ताकि आम मुस्लिम की दूसरे तबके में उन माफियाओं जैसी तस्वीर बने जो आज के राजनीतिक पटल पर मुस्लिम समुदाय भूगत रहा है।
मुस्लिम समुदाय ने कथित सेक्यूलर दलों में मौजूद कथित धर्मनिरपेक्ष लीडर व भाजपा में कुछ हद तक मुस्लिम दोस्त लीडरस में फर्क नहीं समझा जिसके चलते कांग्रेस में कथित सेक्युलर जेहन के यानि छुपे चेहरों की तादाद बढती गई, और भाजपा में मुस्लिम दोस्त कम होते चले गये। यानी भाजपा आज राजनीतिक तौर पर मुस्लिम समुदाय से किनारा सा कर लिया है।
हाल ही में राजस्थान में भाजपा ने चुनाव प्रचार में दर्दनाक कन्हैयालाल हत्याकांड को उछाल कर खासतौर पर मेवाड़ से कोटा-भरतपुर रीजन से लेकर जयपुर तक खूब राजनीतिक लाभ उठाया। वहीं कांग्रेस ने बाबा बालकनाथ के मुख्यमंत्री बनने का मुस्लिम समुदाय में डर बैठाकर खासतौर पर श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ व शेखावाटी रीजन में उनके जमकर वोट खींचे।
जब हर मुमकिन कोशिश के बावजूद मुस्लिम समुदाय के मत नहीं आने को नज़र में रखते हुये 2014 से मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक तौर अछूत बनाने के लिये भाजपा ने धीरे धीरे कोशिश शुरू की जिसका परिणाम यह है कि 6 जुलाई 2022 से केन्द्रीय सरकार में कोई भी मुस्लिम मंत्री नहीं है। भाजपा ने विधानसभा व लोकसभा में अपने दल से मुस्लिम उम्मीदवार नहीं बनाने का सिलसिला शुरू किया। जिसका परिणाम है कि भारत के 28 राज्यों में से 09 को छोड़कर बाकी राज्यों की सरकारों में मुस्लिम मंत्री नहीं है। 08 केन्द्र शासित प्रदेशों में से दिल्ली व लक्षद्वीप को छोड़कर बाकी जगह भी मुस्लिम मंत्री नहीं है। कशमीर में राज्यपाल का शासन है।
कुछ राज्य सरकारों के गठन में कथित सेक्युलर कांग्रेस भी अब भाजपा की तरह अपने मंत्रिमंडल को मुस्लिम मुक्त बनाने लगी है। तेलंगाना व हिमाचल में कांग्रेस सरकार के ताज़ा उदाहरण है। कांग्रेस का कहना है कि उक्त दोनों प्रदेशों में मुस्लिम विधायक नहीं है, मंत्री बनाना मुश्किल है। जबकि तत्तकालीन समय में मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस में मोहम्मद इब्राहिम कुरेशी को बिना विधायक होने के बावजूद मंत्री बनाया गया था। यह सब नियत व सोच पर निर्भर करता है।
देश में इमरजेंसी के बाद हुये लोकसभा चुनाव में उस समय के दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने कांग्रेस के खिलाफ जनता पार्टी को वोट करने की अपील व प्रचार किया था। तब भारत में पहली दफा गैर कांग्रेस सरकार बनी थी। उस जनता पार्टी मंत्रिमंडल में मुस्लिम समुदाय को अहमियत मिली थी। इसके बाद 1989 में जनता दल व अन्य दलों की मिलीजुली सरकार में भी मुस्लिम को मंत्रिमंडल में खास महत्व मिला था। उस सरकार में मुफ्ती मोहम्मद सईद भारत के पहले व अबतक के अंतिम मुस्लिम गृहमंत्री बने थे।
भारत के मुस्लिम इबादतगाहो – सामाजिक स्कूल- कालेज व संस्थाओं में से अधीकांश पर कम पढे लिखे लोगों की हकुमत चलती है। पढे लिखे उनके सामने बैठकर उनका भाषण सूनते हैं। उसी तरह राजनीति में भी अधीकांश लीडर ऐसे ही हैं। तारीफ करनी होगी कि हाल ही में राजस्थान सरकार के गठित मंत्रिमंडल में दो एससी वर्ग के सदस्य जो दोनों यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे हैं। उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद व मंजू बाघमार दोनों डाक्ट्रेट हैं।
कुल मिलाकर यह है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति व मुस्लिम मुक्त होती केन्द्र व राज्य सरकारों को लेकर मुस्लिम समुदाय को अपनी पूरानी घिसी-पिटी राजनीतिक व्यू रचना पर मनन-मंथन करके नये राजनीतिक समिकरण बनाने पर विचार करना चाहिए। साथ ही समुदाय से अच्छी लीडरशिप को उभारने पर विचार करना चाहिए। किसी दल को सत्ता में आने से वो अकेले रोक नहीं सकते और ना ही वो अकेले किसी दल को सत्ता में ला सकते हैं। देश का-20 प्रतिशत वाला मुस्लिम समुदाय राजनीतिक तौर पर धीरे धीरे प्रभावहीन होता जा रहा है।
