आस्था और हिंसा का संगम: पांढुर्णा का विवादित गोटमार मेला | New India Times

मोहम्मद सिराज, ब्यूरो चीफ, पांढुर्णा (मप्र), NIT:

आस्था और हिंसा का संगम: पांढुर्णा का विवादित गोटमार मेला | New India Times

जाम नदी के किनारे पांढुर्णा और सावरगांव गांवों के बीच पत्थरबाजी के खूनी खेल के लिए जानी जाती है। यह मेला हर साल भाद्रपद मास की अमावस्या को, पोला त्योहार के अगले दिन मनाया जाता है। मराठी भाषा में “गोटमार” का अर्थ है “पत्थर मारना,” और यह नाम इस परंपरा की प्रकृति को स्पष्ट करता है।

आस्था और हिंसा का संगम: पांढुर्णा का विवादित गोटमार मेला | New India Times

परंपरा और कहानी
गोटमार मेले की शुरुआत एक प्रेम कहानी से जुड़ी मानी जाती है। किंवदंती के अनुसार, लगभग 300 साल पहले पांढुर्णा के एक युवक और सावरगांव की एक युवती के बीच प्रेम प्रसंग था। दोनों ने चुपके से विवाह कर लिया, लेकिन जब युवक अपनी प्रेमिका को भगाकर ले जा रहा था, तब वे जाम नदी पार कर रहे थे। सावरगांव के लोगों को यह बात पता चली, और उन्होंने प्रेमी युगल पर पत्थरों से हमला कर दिया। जवाब में, पांढुर्णा के लोगों ने भी पत्थरबाजी शुरू की। इस हिंसक पत्थरबाजी में दोनों प्रेमियों की मृत्यु हो गई। बाद में, दोनों गांवों के लोगों को अपनी गलती का पश्चाताप हुआ, और उन्होंने प्रेमी युगल का अंतिम संस्कार मां चंडिका के मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ किया। तभी से इस घटना की याद में गोटमार मेला शुरू हुआ, जो अब परंपरा बन चुकी है।
मेले का स्वरूप

पत्थरबाजी और झंडा: मेले की शुरुआत मां चंडिका की पूजा के साथ होती है। जाम नदी के बीच में एक पलाश का पेड़ गाड़ा जाता है, जिस पर सावरगांव पक्ष एक भगवा झंडा बांधता है। इस झंडे को सावरगांव के लोग अपनी “लड़की” का प्रतीक मानते हैं। पांढुर्णा पक्ष का लक्ष्य इस झंडे को तोड़ना होता है, जबकि सावरगांव पक्ष इसे बचाने की कोशिश करता है। दोनों पक्ष नदी के किनारों से एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं, जिससे यह खेल हिंसक और खूनी हो जाता है। मेला सुबह शुरू होकर शाम तक चलता है, और जो पक्ष झंडा तोड़ लेता है, उसे विजेता माना जाता है।

हिंसा और घायल: इस परंपरा में हर साल सैकड़ों लोग घायल होते हैं। उदाहरण के लिए, 2024 में 320 लोग घायल हुए, जिनमें 4 की हालत गंभीर थी। इतिहास में 1955 से 2023 तक कम से कम 13 लोगों की मौत हो चुकी है, और कई लोग स्थायी रूप से अक्षम हो गए हैं।

प्रशासनिक प्रयास: जिला प्रशासन इस खूनी खेल को रोकने के लिए कई बार प्रयास कर चुका है। धारा 144 लागू की जाती है, ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी होती है, और स्वास्थ्य शिविर लगाए जाते हैं। 2001 में प्रशासन ने पत्थरों की जगह प्लास्टिक की गेंदें उपलब्ध कराई थीं, लेकिन लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया। मानवाधिकार संगठनों ने भी इस परंपरा पर रोक लगाने की मांग की है, लेकिन यह आस्था और परंपरा के नाम पर जारी है।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
हालांकि यह मेला एक दुखद प्रेम कहानी से शुरू हुआ, लेकिन स्थानीय लोग इसे धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा मानते हैं। मां चंडिका की पूजा इस मेले का अभिन्न हिस्सा है, और दोनों पक्ष मेले के समापन पर झंडे को मंदिर में अर्पित करते हैं। इसके बावजूद, यह परंपरा अपनी हिंसक प्रकृति के कारण विवादों में रहती है। कुछ लोग इसे प्रायश्चित के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसे अंधविश्वास और खतरनाक रिवाज मानते हैं।

आलोचना और विवाद 1955 से अब तक कई लोगों की जान जा चुकी है, और परिवारों ने अपनों को खोने का दर्द सहा है।
प्रशासन की लाचारी: भारी पुलिस बल और प्रतिबंधों के बावजूद, यह परंपरा रुक नहीं पाई है। कुछ मौकों पर पुलिस को बल प्रयोग और गोलीबारी तक करनी पड़ी, जैसे 1978 और 1987 में, जब दो लोगों की मौत हुई।

मानवाधिकार: मानवाधिकार संगठन इस मेले को बंद करने की मांग करते हैं, क्योंकि यह मानव जीवन के लिए खतरा है। फिर भी, स्थानीय लोगों की आस्था और परंपरा के प्रति लगाव के कारण इसे रोकना मुश्किल रहा है।

निष्कर्ष गोटमार मेला एक ऐसी परंपरा है जो पांढुर्णा और सावरगांव की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, लेकिन इसकी हिंसक प्रकृति इसे विवादास्पद बनाती है। यह मेला प्रेम, पश्चाताप, और आस्था की कहानी को दर्शाता है, लेकिन इसके खूनी स्वरूप ने इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। प्रशासन और समाज के बीच इस परंपरा को संशोधित करने या बंद करने को लेकर बहस जारी है।

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