अशफाक कायमखानी, जयपुर (राजस्थान), NIT;
सामाजिक तौर पर विभिन्न आय के श्रोत होने के बावजूद मुस्लिम समाज द्वारा चलाये जा रहे तालीमी इदारों से मुस्लिम स्टूडेंट्स का मोहभंग होना पुरे मुस्लिम समुदाय के लिये एक गम्भीर विचारणीय विषय बनता जा रहा है।
राजस्थान के अलग अलग जिलों व कस्बों में मुस्लिम समाज द्वारा सामुहिक तौर पर या फिर अलग अलग बिरादरियों के अपने स्तर पर संचालित हो रहे अधिकांश तालीमी इदारों से समाज के स्टूडेंट्स का मोहभंग होने से उन इदारों के बजाय हमारे स्टूडेंट्स अन्य तालीमी इदारों में प्रवेश पाकर तालीम हासील करना उचित मानने लगे हैं, जिसका प्रमुख कारण जमाने के बदलाव के साथ हम हमारे इदारों के “शैक्षणिक सिस्टम” में बदलाव नहीं ला पाये एवं अच्छी फेकल्टीज के बजाय सस्ती से सस्ती फेकल्टीज को इदारों में कायम करने की अपनी पुरानी आदत से छुटकारा नहीं ले पाये। इसके साथ ही उक्त इदारों की प्रबंध समितियों में आज भी पचास साल पीछे की सोच रखने वाले लोगों का भाप के इंजान की तरह काम करने का तरीका भी आज के दौर के साथ दौड़ने नही देने का प्रमुख कारण बन चुका है।
राजस्थान के अनेकों उदाहरणों में से जयपुर की मुस्लिम स्कूल/कॉलेज व सीकर की इस्लामिया स्कूल/कॉलेज जैसै दो उदाहरण को सामने रखकर जरा सा भी इनके हालात पर विश्लेषण करें तो स्टूडेंट्स के हमारे तालीमी इदारों से मोहभंग होने की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। एक जमाना तक सीमित आय के स्त्रोत के बल पर चलने वाले इन इदारों में हजारों हजार बच्चे तालीम हासील करने आते थे एवं आज नो-दस आय के अच्छे स्त्रोत होने के बावजूद इन इदारो में चंद बच्चे तालीम हासिल करने आ रहे हैं।
कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान में सामाजिक तौर पर चलने वाले हमारे तालीमी इदारों के आय के नो-दस स्त्रोत होने के बावजूद हम उन इदारों की दशा व दिशा सुधार नहीं पा रहे हैं, जबकि सीकर में वाहिद चौहान अकेला शख्स अपने ऐक्सीलैंस गलर्स स्कूल के मार्फत हर साल करीब तीन-चार हजार लड़कियों को अंग्रेजी माध्यम की तालीम मुफ्त उपलब्ध करवा रहा है। दूसरी तरफ नजर डालें तो पाते हैं कि ऐक्सीलैंस गलर्स स्कूल में प्रवेश पाने के लिए छात्राओं की लम्बी कतार लगती है तो उक्त इदारों मे छात्रों की तादात घटते घटते दो-चार सौ तक पहुंच गई है।
