गणेश मौर्या, ब्यूरो चीफ, अंबेडकर नगर (यूपी), NIT:
उत्तर प्रदेश के आंबेडकरनगर जिले में स्वास्थ्य विभाग का एक ऐसा अजीबोगरीब फरमान सामने आया है, जिसे सुनकर आम जनता ही नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के जानकार भी हैरान हैं। जिले में अवैध अस्पतालों, बिना लाइसेंस संचालित पैथोलॉजी सेंटरों, मेडिकल स्टोरों और झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ 16 नवंबर से 30 नवंबर तक विशेष जांच अभियान चलाया जाना है। लेकिन अभियान की समय-सीमा और तौर-तरीकों ने विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ढोल पीटकर चोरों को सतर्क करने जैसी रणनीति!
अजीब विडंबना यह है कि कार्रवाई से पहले ही अधिकारियों ने अभियान का ढिंढोरा पीट दिया है। सवाल उठता है कि क्या चोरों को पकड़ने से पहले उन्हें यह बता दिया जाता है कि पुलिस आने वाली है? क्या 16 नवंबर तक झोलाछाप डॉक्टर और अवैध क्लीनिक संचालक अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर बैठ जाएंगे? या फिर 15 दिन की इस अग्रिम सूचना के सहारे कागजों में सब कुछ दुरुस्त कर लिया जाएगा?
राजेसुल्तानपुर से भीटी तक उठ रहे तीखे सवाल
जिले के राजेसुल्तानपुर से लेकर भीटी तक वर्षों से संचालित हो रहे कथित अवैध अस्पतालों और मेडिकल प्रतिष्ठानों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। क्या इस अभियान के बाद ये प्रतिष्ठान रातोंरात वैध हो जाएंगे?
ऑनलाइन आवेदन की रसीद दिखाकर अस्पताल चलाने वालों को आखिर इतना लंबा समय और छूट क्यों दी जा रही है? फायर सेफ्टी, बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन और कथित फर्जी डॉक्टरों की शैक्षणिक योग्यता की जांच को लेकर जारी यह फरमान कहीं केवल कागजी खानापूर्ति बनकर तो नहीं रह जाएगा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पूर्व में सील किए गए जिन अस्पतालों के ताले दोबारा खुल गए, उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? ऐसे मामलों में जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही कब तय की जाएगी?
जनता और जागरूक नागरिकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि 16 नवंबर से शुरू होने वाला यह विशेष अभियान वास्तव में जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई करेगा या फिर यह भी कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।

