जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की मुश्किलें कानूनी मोर्चे पर बढ़ती नजर आ रही हैं। भगवान श्रीकृष्ण को लेकर की गई कथित विवादित टिप्पणी के मामले में आगरा की अदालत में उनके खिलाफ मानहानि का वाद दायर किया गया है। यह वाद आगरा के मघटई निवासी अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन-पंचम) कंचन कुमारी की अदालत में प्रस्तुत किया है। अदालत ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद अगली सुनवाई के लिए 14 दिसंबर की तारीख निर्धारित की है।
क्या है पूरा मामला और वादी की दलील?
अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने अदालत में दलील दी कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में मानव रूप में हुआ था। उन्होंने दावा किया कि वह मातृ पक्ष की ओर से भगवान श्रीकृष्ण के वंशज हैं। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्य के तौर पर मथुरा गजेटियर और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के प्रथम महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम की वर्ष 1882-83 की ऐतिहासिक रिपोर्ट ‘रिपोर्ट ऑफ ए टूर इन ईस्टर्न राजपूताना’ अदालत में प्रस्तुत की। उनके अनुसार, इस रिपोर्ट में जादौन/यदुवंशी क्षत्रियों को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज बताया गया है।
वादी का कहना है कि धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी से भगवान श्रीकृष्ण के वंशजों की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है और सनातन धर्म के अनुयायियों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री ने मध्य प्रदेश के शिवपुरी में आयोजित एक कथा के दौरान भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप, मुद्राओं एवं भंगिमाओं की तुलना की थी। इस दौरान उन्होंने श्रीकृष्ण के ‘त्रिभंग’ स्वरूप (तीन स्थानों से मुड़ी हुई शारीरिक मुद्रा), बांसुरी बजाने की शैली और कमर लचकाने को लेकर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी।
इस बयान का वीडियो सामने आने के बाद ब्रज क्षेत्र के श्रद्धालुओं और हिंदू संगठनों में नाराजगी फैल गई। इसके बाद उनकी टिप्पणी को लेकर विरोध शुरू हो गया।
धीरेंद्र शास्त्री ने जारी किया माफीनामा
विवाद बढ़ने और हिंदू संगठनों के विरोध के बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने वीडियो संदेश जारी कर सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि उनका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या आराध्य देवों के बीच किसी प्रकार का भेद पैदा करना नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी ब्रज की पारंपरिक और सहज भक्ति-रस धारा के संदर्भ में थी।

