योग तपस्या भट्टी में ब्रह्माकुमारीज ने दिया कर्मों की गुह्य गति, मौन और दातापन का संदेश | New India Times

मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

योग तपस्या भट्टी में ब्रह्माकुमारीज ने दिया कर्मों की गुह्य गति, मौन और दातापन का संदेश | New India Times

ब्रह्माकुमारीज द्वारा स्थानीय राजस्थान भवन में आयोजित योग तपस्या भट्टी में बड़ी संख्या में ब्रह्माकुमार भाई-बहनों ने भाग लिया। कार्यक्रम में पंजाब से आईं ब्रह्माकुमारी प्रेम दीदी ने कर्मों की गुह्य गति पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए प्रेरणादायी प्रसंग सुनाए।

उन्होंने राजा विक्रमादित्य से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक बार राजा के मन में संकल्प आया कि जिस प्रकार वे पिछले जन्म के कर्मों के आधार पर राजा बने हैं, उसी प्रकार आने वाले जन्म को बेहतर बनाने के लिए उन्हें कौन से कर्म करने चाहिए। उन्होंने अपने दरबारियों से विचार-विमर्श किया कि इस प्रश्न का उत्तर कौन दे सकता है। तब मंत्री ने कहा कि उनकी पुत्री इसका उत्तर दे सकती है, लेकिन उसकी दो शर्तें हैं—राजा को उसके निवास पर जाना होगा और उसे बहन कहकर संबोधित करना होगा। राजा दोनों शर्तों के लिए सहमत होकर मंत्री के घर गए।

मंत्री की पुत्री ने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर एक ऐसे बालक से मिलेगा, जिसका जन्म एक सप्ताह बाद होगा और जो केवल एक घंटे तक जीवित रहेगा। राजा ने एक सप्ताह इंतजार किया। बालक के जन्म वाले दिन राजा उस घर की ओर जाने लगे। रास्ते में उन्हें एक युवक मिट्टी खाता दिखाई दिया। यह देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। आगे बढ़ने पर उन्होंने एक महिला को बार-बार गिरकर उठते हुए देखा और वहीं एक पुरुष को भीख मांगते हुए देखा।

इसके बाद राजा उस स्थान पर पहुंचे, जहां बालक का जन्म होने वाला था। कुछ समय बाद बालक का जन्म हुआ। राजा ने बालक से पूछा कि उनका पिछला जन्म कैसा था। बालक ने बताया कि उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता और भाई-बहन सहित छह लोग मुश्किल से अपना गुजारा करते थे। एक दिन घर में छह रोटियां बनी थीं। तभी एक भिखारी आया और उसने भोजन मांगा। राजा के माता-पिता और अन्य भाई-बहनों ने उसे अपशब्द कहकर वहां से जाने को कहा। लेकिन राजा ने अपने हिस्से की एक रोटी और उनकी बहन ने आधी रोटी उस भिखारी को दे दी।

बालक ने बताया कि रास्ते में राजा ने जिन लोगों को देखा, उनकी वर्तमान स्थिति उनके पूर्व कर्मों का परिणाम थी। वहीं, राजा और मंत्री की पुत्री द्वारा भिखारी को अपनी रोटी देना उनके पुण्य कर्मों का परिणाम था, जिसके कारण एक को राजा और दूसरी को मंत्री की पुत्री के रूप में जन्म मिला। इस प्रसंग के माध्यम से प्रेम दीदी ने कहा कि हमें अपने हर विचार, वचन और कर्म को सोच-समझकर करना चाहिए तथा त्याग और परोपकार की भावना रखनी चाहिए।

प्रेम दीदी ने कर्मों की गुह्य गति से जुड़े अनेक प्रेरणादायी उदाहरणों के माध्यम से उपस्थित ब्रह्माकुमार भाई-बहनों को ईश्वरीय ज्ञान एवं मार्गदर्शन दिया।

पंजाब से आईं सचल दीदी ने कहा कि मौन रहना बहुत बड़ी तपस्या है। उन्होंने कहा कि कब बोलना है और कब चुप रहना है, यह भी एक कला है। धृतराष्ट्र के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जहां उन्हें बोलना चाहिए था, वहां वे चुप रहे। उन्होंने कहा कि जब हम चुप रहते हैं तो लोग कहते हैं कि नाराज हैं और बोल नहीं रहे हैं। जब धीरे बोलते हैं तो कहते हैं कि कुछ समझ में नहीं आ रहा है। जब मीठा बोलते हैं तो लोग कहते हैं कि कोई काम निकालना है, इसलिए मीठा बोल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भगवान ने हमें कम बोलने की शिक्षा दी है—‘एक चुप, सौ सुख।’ धीरे बोलने का अर्थ है कि सामने वाला डरे या सहमे नहीं। मीठा बोलने का उद्देश्य है कि सभी हमारी बात शांति और प्रेम से सुनें, हमारे करीब आएं और अपनी बात साझा करें। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग कहते हैं कि कड़वा बोलना पड़ता है, मीठे बोलने से काम नहीं चलता, लेकिन ऐसा नहीं है। खुशामद और मीठा बोलने में बहुत अंतर है। शिव बाबा ने हमें मीठा बोलना सिखाया है, इसलिए हर परिस्थिति में मीठा बोलना चाहिए।

उन्होंने सम्राट अकबर और बीरबल का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा कि दुनिया में सबसे मीठी चीज क्या है। बीरबल ने उत्तर दिया कि सबसे मीठी चीज मनुष्य की जुबान या बोली है। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि मधुर वाणी में बहुत शक्ति होती है। अनेक उदाहरणों के माध्यम से सचल दीदी ने बताया कि दैवीय गुणों को अपनाकर अपने और दूसरों के जीवन को सुखी, शांत और आनंदमय बनाया जा सकता है।

‘महादानी और वरदानी बनो’—ब्रह्माकुमार गणेश भाई

बिहार से आए ब्रह्माकुमार गणेश भाई ने कहा कि दातापन की स्थिति में रहना चाहिए, क्योंकि भगवान ने हमें हर तरह से भरपूर किया है। सुबह उठते ही भगवान से वरदान लेकर यह संकल्प करें कि जो भी हमारे सामने आए, उसे कुछ न कुछ देना है। सबसे पहले उसे शुभकामनाएं दें और उसके बाद जरूरत के अनुसार उसकी मदद करें। घर हो या बाहर, हर जगह इस पाठ को खुशी से अपनाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दूसरों के अवगुण देखने और उन पर चिंतन करने से बचना चाहिए। कमियां देखने के बजाय सभी की अच्छाइयों को देखना ही दातापन के लक्षण हैं। अपने मुख से शंख की तरह पवित्र वाणी निकालें। योग तपस्या भट्टी की सफलता इसी में है कि हम अपनी अवस्था को सुधारें। बड़ा बनना है तो अपनी कमियों को दूर कर सद्गुणों को अपनाना होगा। दाता बनने के लिए बड़ा दिल रखकर सभी को कुछ न कुछ देने की भावना रखनी चाहिए, तभी मनुष्य देवतुल्य बन सकता है।

ब्रह्माकुमारी मंगला दीदी एवं सभी सहयोगियों के प्रयासों से स्थानीय राजस्थान भवन में योग तपस्या भट्टी का सफल आयोजन हुआ।

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