संदीप तिवारी, ब्यूरो चीफ, पन्ना (मप्र), NIT:

स्वच्छता को लेकर देशभर में चलाए जा रहे अभियानों के बीच अमानगंज नगर परिषद कार्यालय की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है। यहां हालात “दीपक तले अंधेरा” वाली कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करते नजर आ रहे हैं।
कार्यालय परिसर में प्रवेश करते ही कचरे के ढेर, चाय के डिस्पोजल गिलास और नारियल पानी के अवशेष फैले दिखाई देते हैं। जो कर्मचारी शहर को स्वच्छता का संदेश देने की जिम्मेदारी निभाते हैं, वे स्वयं डस्टबिन के उपयोग में लापरवाही बरतते दिख रहे हैं।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब शुद्ध पेयजल के लिए लगाए गए वॉटर कूलर के आसपास की दीवारें पान और गुटखे की पीक से सनी नजर आती हैं। यह केवल गंदगी नहीं, बल्कि जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
कार्यालय परिसर में जालियों के पास पड़ी शराब की खाली बोतलें सुरक्षा और अनुशासन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। सरकारी परिसर में इनकी मौजूदगी प्रशासनिक निगरानी पर भी सवाल उठाती है। वहीं, शौचालय की हालत बेहद खराब है और बाहर बना मूत्रालय टूट-फूट कर लगभग अनुपयोगी हो चुका है।

बस स्टैंड पर भी बदहाल व्यवस्था
नगर के नए बस स्टैंड की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है। यहां रखा डस्टबिन जमीन में स्थापित करने के बजाय यूं ही रखा हुआ है, जिससे कचरा इधर-उधर फैल रहा है। नालियां प्लास्टिक कचरे से भरी पड़ी हैं, जो हल्की बारिश में भी जलभराव का कारण बन सकती हैं।
ध्वज स्तंभ के पास बहता पानी और फैला कबाड़ क्षेत्र की बदहाली को बयां करता है, लेकिन संबंधित अधिकारियों की चुप्पी समझ से परे है।
सुधार की जरूरत
स्पष्ट है कि स्वच्छता केवल अभियान नहीं, बल्कि एक आदत और जिम्मेदारी है। जब तक नगर परिषद के अधिकारी और कर्मचारी स्वयं अनुशासन का पालन नहीं करेंगे, तब तक शहर को स्वच्छ बनाने के प्रयास केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।
अब आवश्यकता कागजी दावों से आगे बढ़कर धरातल पर ठोस सुधारात्मक कदम उठाने की है, ताकि स्वच्छता अभियान की मंशा वास्तव में साकार हो सके।
