सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम: आधुनिक परवरिश की नई सामाजिक चुनौती | New India Times

अंकित तिवारी, ब्यूरो चीफ, प्रयागराज (यूपी), NIT:

सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम कोई चिकित्सा या आनुवंशिक विकार नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्थिति है, जिसके लिए हिंदी में अभी तक कोई आधिकारिक शब्द नहीं है। यह सिंड्रोम एक परवरिश संबंधी विकृति है, जिसमें बच्चे को छह वयस्कों — दादा-दादी, माता-पिता और नाना-नानी — से अत्यधिक लाड़-प्यार और ध्यान मिलता है। इससे बच्चों में हकदारी की भावना, अहंकार और निराशा को सहन न कर पाने जैसी प्रवृत्तियाँ विकसित होती हैं।

इस सिंड्रोम की जड़ें चीन की ‘एक-बच्चा नीति’ में पाई जाती हैं। वहाँ इसे “Little Emperor Syndrome” (छोटे सम्राट का सिंड्रोम) कहा जाता है। भारत में भी बढ़ती संपन्नता, छोटे परिवारों का चलन और अत्यधिक महत्वाकांक्षी पालन-पोषण ने ऐसी ही स्थितियाँ पैदा की हैं। आजकल एक या दो बच्चों वाले परिवारों में माता-पिता, दादा-दादी और नाना-नानी — यानी छह जेबें (six pockets) — सारा स्नेह और संसाधन एक ही बच्चे पर खर्च कर देते हैं।

मुख्य लक्षण

अत्यधिक निर्भरता: बच्चे छोटे-छोटे कामों (जैसे बैग उठाना, जूते पहनना, पेंसिल-रबर लेना) के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहते हैं।

धैर्य की कमी: वे किसी भी चीज़ का इंतज़ार नहीं कर पाते और हर इच्छा तुरंत पूरी करवाना चाहते हैं।

साझा करने में कठिनाई: अपनी चीज़ें दूसरों को देने में संकोच करते हैं।

शीघ्र निराश होना: इच्छा पूरी न होने पर अत्यधिक गुस्सा या रोना शुरू कर देते हैं।

लगातार प्रशंसा की चाह: हर काम पर तारीफ पाने की अपेक्षा रखते हैं।

कम सहनशीलता: अस्वीकृति या आलोचना को सहन नहीं कर पाते, जिससे असफलता के समय मानसिक संघर्ष बढ़ जाता है।

पुरस्कार-आधारित व्यवहार: प्यार को भौतिक पुरस्कारों से जोड़ते हैं और तत्काल संतोष चाहते हैं।

भावनात्मक अपरिपक्वता: धैर्य, सहानुभूति और आत्म-नियंत्रण की कमी होती है।

अन्य लक्षण:

वरिष्ठजनों व सामाजिक शिष्टाचार के प्रति कम सम्मान।

व्यवहार और संवाद में अनौपचारिकता व अपमानजनकता।

सोशल मीडिया पर तुलना के कारण भावनात्मक अस्थिरता।

स्वतंत्र रूप से समस्याओं का समाधान न कर पाना।

आलोचनात्मक सोच की क्षमता में कमी।

अहंकारी व्यवहार के कारण संबंधों में तनाव, जिससे आगे चलकर आक्रामकता, नशे की प्रवृत्ति व मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

मुख्य कारण

परिवार के सभी सदस्यों का बच्चे पर अत्यधिक ध्यान और लाड़-प्यार।

हर मांग को तुरंत पूरा करना।

आर्थिक संपन्नता के कारण अति-खर्चीली परवरिश।

संयुक्त परिवारों का अभाव और एकल बच्चे की प्रवृत्ति।

माता-पिता की व्यस्त जीवनशैली और अपराधबोध के चलते अत्यधिक रियायतें देना।

बचाव और प्रबंधन

बच्चों की आवश्यकताओं को तार्किक ढंग से पूरा करें।

पालन-पोषण में लाड़-प्यार और अनुशासन का संतुलन रखें।

बच्चों को अपनी छोटी जिम्मेदारियाँ स्वयं निभाने के लिए प्रेरित करें।

“ना” कहना भी सीखाएँ और निराशाजनक स्थितियों का सामना खुद करने दें।

स्पष्ट सीमाएँ तय करें और उनका पालन स्वयं भी करें।

अनावश्यक प्रशंसा से बचें, बल्कि अच्छे प्रयासों की सराहना करें।

बच्चों को यह समझाएँ कि हर व्यक्ति की अपनी ताकत और कमजोरियाँ होती हैं।

पॉकेट मनी या विशेष सुविधाएँ तभी दें जब बच्चा अपना कार्य पूर्ण करे।

सहानुभूति, सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व सिखाने के लिए सामूहिक गतिविधियाँ करवाएँ।

बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों और सोशल मीडिया उपयोग पर निगरानी रखें।

संयुक्त परिवार का सहयोग अनुशासन और मूल्यों को मजबूत करता है।

निष्कर्ष: सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम एक पालन-पोषण आधारित विकृति है जिसे परिवार के सहयोग, समझदारी और मनोवैज्ञानिक परामर्श से दूर किया जा सकता है। सही मार्गदर्शन से बच्चे को आत्मनिर्भर, संवेदनशील और संतुलित व्यक्तित्व की दिशा में विकसित किया जा सकता है।

By nit

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