अली अब्बास, ब्यूरो चीफ, मथुरा (यूपी), NIT:
वैदिक संस्कृति व संस्कारों के प्रचार-प्रसार का उद्देश्य लिए मात्र दस वर्ष की आयु की एक लडकी जब सकारात्मक सोच लिए आगे बढ़ी तो सभी कठिनाइयों को दरकिनार करते हुए आज वह उस मुकाम तक पहुंच गयी, जिसे अनेक लडकियां अपनी प्रेरणास्त्रोत मानने लगी हैं तथा सनातन संस्कृति के प्रचारकों में उनकी गिनती प्रमुखता से की जाती है।
हम बात कर रहे हैं मथुरा की ताराधाम कॉलोनी निवासी संस्कार जागृति मिशन की अध्यक्ष व आर्य समाज की वरिष्ठ प्रचारिका प्रोफेसर डाॅ. अर्चना प्रिय आर्य की। डाॅ. अर्चना प्रिय आर्य दस वर्ष की आयु से ही वैदिक संस्कृति व संस्कारों के प्रचार-प्रसार का कार्य कर रही हैं। उन्होंने बताया कि उनके पैतिृक गांव ऊँचागांव में लगभग 26 वर्ष पूर्व आर्य समाज का कार्यक्रम हुआ था, जिसमें आये आर्य विद्धान व विदुषियों से प्रभावित होकर यह संकल्प लिया था कि वह भी समाज सुधार के इस अभियान को आगे बढायेंगी। पिता आचार्य सत्यप्रिय आर्य व माता श्रीमती सरोज रानी आर्य ने संबल प्रदान किया और मात्र दस वर्ष की आयु से ही महर्षि दयानंद सरस्वती की विचारधारा, वैदिक संस्कृति व संस्कारों को जन-जन तक पहुंचाने में जुट गईं। इस यात्रा में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पडा लेकिन वह अपने ध्येय से भटकी नहीं। आज उनकी गिनती आर्य समाज के वरिष्ठ प्रचारकों में की जाती है।
इसे साकार करने के लिए उन्होंने संस्कार जागृति मिशन की स्थापना की। विभिन्न संस्थाओं द्वारा उनको आदर्श नारी अवार्ड, आर्य रत्न अवार्ड, राष्ट्रीय नारी शक्ति सम्मान, शिक्षक रत्न सम्मान, राष्ट्रीय गौरव पुरूस्कार, इंडियन आइकाॅन, आदर्श शिक्षा रत्न, भारत सेवा रत्न, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पुरूस्कर, संस्कृति रक्षिका की उपाधि आदि से सम्मानित किया जा चुका है।

