नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ़, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 15 जून तक चुनाव आयोग की ओर से महाराष्ट्र निकाय चुनावों का नोटिफिकेशन जारी हो जाएगा। लोकसभा चुनाव के छह महीने बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अचानक 75 लाख वोटर बढ़ गए और महायुति ने 125 सीटें महज 0 से 25 हजार वोटों के कमज़ोर मार्जिन से जीती। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग से फेडरल वोटर लिस्ट मांगी जिसे आयोग ने नहीं दी। इस मामले पर राहुल ने सरकार से संसद में व्यापक चर्चा की मांग की जिससे डरकर मोदी सरकार भाग खड़ी हुई। यही वोटर लिस्ट अब महाराष्ट्र के आगामी निकाय चुनावों में इस्तेमाल करी जाएगी तो क्या विधानसभा के नतीजे निकाय चुनावों में फिर से दोहराए जाएंगे ? चुनाव आयोग को अगर इसी तरह धांधली से चुनाव करवा लेने है तो गरीबों के टैक्स से सरकारी तिज़ोरी में जमा होने वाला हजारों करोड़ रुपया फ़िज़ूल में चुनाव पर क्यों खर्च किया जाना चाहिए ?

चुनाव आयोग ने वोटर कार्ड को आधार से जोड़ने का अभियान शुरू किया था जो किसी के राजनीतिक दबाव के कारण ठप सा पड़ गया है। शहरों की नगर परिषदों महानगर पालिकाओं की वोटर लिस्ट में आसपड़ोस की ग्राम पंचायत क्षेत्रो से सैकड़ों वोटर जोड़े गए हैं। ये वोटर ग्राम पंचायत और निगम इन दोनों की वोटर लिस्ट में शामिल है। राजनीतिक दल के आका अपनी पार्टी को जितवाने के लिए इन डुएल वोटर्स से वोट डलवा लेते हैं। उदाहरण के तौर पर जलगांव जिले के जामनेर नगर परिषद को ले लीजिए यहां गांव कस्बों से साढ़े तीन से पांच हजार वोट अतिरिक्त बताए जा रहे हैं। लोकल स्तर पर काम करने वाला पक्ष-विपक्ष इस मसले पर खामोश क्यों है ? अनचाहे नतीजे आने के बाद हारने वाली पार्टी खुद के साथ आम आदमी को EVM को दोष देने का काम सौंप देती है। वोटर लिस्ट और EVM दोनों की ईमानदारी पर उठते संदेहों का अंतिम जवाब बैलेट पेपर पर मतदान करवाना है जो मोदी सरकार के रहते मुमकिन नहीं है। राजा की जान तोते में है और तोता मिर्ची नहीं बल्की लोकतंत्र को खा रहा है।

