नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ़, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:
पेचीदा कानूनी मामलों के संवैधानिक फ्रेम वर्क में बार बार पिट रही मोदी सरकार को वक़्फ़ संशोधन 2025 को लेकर एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खानी पड़ी है। चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया बी आर गवई और जस्टिस ए जी मसीह की खंडपीठ ने अंतरिम रोक पर विचार करने के लिए 20 मई को अगली सुनवाई रखी है। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रोक को हटाने की मांग की थी। वक्फ संशोधन 2025 के तीन प्रावधानों पर पूर्व CJI संजीव खन्ना द्वारा लगाई गई रोक अगले आदेश तक कायम रहेगी। गुरुवार 15 मई की सुनवाई में कोर्ट ने सरकार की आड़ में पैरवी कर रहे पक्ष की 1995 के कानून को नहीं मानने की भूमिका को सिरे से खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि हम अधिनियम 1995 के किसी भी प्रावधान के अनुरोध या स्थगन पर विचार नहीं करेंगे हम यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सिर्फ़ इस लिए की कोई अधिनियम 2025 को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है कोई बस बीच में कूदकर अधिनियम 1995 को चुनौती देना चाहता है यह स्वीकार्य नहीं होगा। पिछली सुनवाई में मोदी सरकार ने कोर्ट में 1332 पन्ने का हलफनामा दाखिल किया था जिसमें वक़्फ़ प्रॉपर्टीज में कई गुना बढ़ोतरी का दावा किया जिसे प्रतिपक्ष ने झूठ साबित किया है। सरकारी अधिवक्ता तुषार मेहता ने अतिरिक्त तथ्य प्रस्तुत करने के लिए अदालत से 19 मई तक का समय मांग लिया है। जबकि याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील कपिल सिब्बल तथ्य सामने रखने को तैयार थे। ज्ञात हो कि वक़्फ़ संशोधन अधिनियम 2025 को संविधान के अनुच्छेद 26 के आधार पर परखा जाएगा जिस पर खरा उतर पाने की उसकी प्रामाणिकता नहीं है। इस खबर में हम महाराष्ट्र जलगांव के जामनेर निवासी अकील बेग का वीडियो प्रकाशित कर रहे हैं इसका संदेश आम नागरिकों को प्रेरित करेगा। मजदूरी करने वाले बेग सोशल मीडिया एक्टिविस्ट के साथ साथ लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं।

