चुनावी बॉन्ड के भंवर में फंसती भाजपा, दलालों से भी ले लिया चंदा | New India Times

मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

चुनावी बॉन्ड के भंवर में फंसती भाजपा, दलालों से भी ले लिया चंदा | New India Times
लेखक: डॉ सैयद खालिद कैस एडवोकेट
समीक्षक, आलोचक, लेखक भोपाल मप्र

लोकसभा चुनावों की आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद जहां सभी राजनैतिक दल चुनावी मैदान में जोर आजमाइश के लिए उतरे हुए हैं, अपनी-अपनी सरकार बनाने के दावे ठोंक रहे हैं वही दूसरी ओर चुनावी बॉन्ड योजना से जुड़ी खबरों ने सत्ता धारी भाजपा को बेनकाब कर दिया है। जिस प्रकार की खबरें निकल कर आ रही हैं उनसे यह बात पूर्णतः स्पष्ट हो चुकी है कि चंदे का धंधा बनाने वाली भाजपा ने किस प्रकार अपने राजनैतिक अस्त्र शस्त्रों से धन कमाया है। चाहे वह महामारी कोरोना दवा का डोज देने वाली कंपनी हो, चाहे लॉटरी किंग का काला धन। भाजपा ने धन पीटने के नाम पर धर्म अधर्म सब को किनारे कर अपनी धन पिपासा को शांत किया है। काला धन उजागर करने वाले खुद काली कमाई के फेर में आगए।

पिछले 10 साल की पारी खेलने के बाद नरेंद्र मोदी जी की अगुवाई वाली भाजपा (यहां यह स्पष्ट हो चुका है कि 1980 में स्थापित भाजपा के नवीन अवतार के बाद मोदी जी खुद भाजपा से बुलंद हो गए हैं और वह भाजपा के तारणहार के भूमिका में आ चुके हैं। विशुद्ध भारतीय जनता पार्टी, जिसे अटल बिहारी वाजपेई, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे राजनेताओं ने क़ायम किया था वह पथभ्रष्ट होकर मोदी एंड फ्रेंड्स कंपनी बन गई है) मोदी सरकार तीसरी पारी की तैयारी में 400 प्लस का दावा कर रही है। वहीं खरीदी हुई गोदी मीडिया द्वारा जिस प्रकार मोदी एंड कंपनी के प्रचार कर विपक्ष का बहिष्कार किया है। वह किसी से छिपा नहीं। सारे विश्व को नज़र आने वाले जलते हुए मणिपुर राज्य से मुंह छिपाते प्रधानमंत्री मोदी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दम पर फिर एक बार ऐतिहासिक जीत की दावेदारी पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर इन दिनों भारतीय परिदृश्य में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद चुनावी बॉन्ड योजना की आग ने भाजपा के असली रूप को उजागर कर दिया है। वही चुनावी बॉन्ड जिसके जरिए बीजेपी सबसे ज्यादा चंदा हासिल करने वाली पार्टी बनकर उभरी है।

आज सम्पूर्ण देश में चुनावी बॉन्ड योजना का जमकर शोर सुनाई दे रहा है। वही चुनावी या इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम, जिसे 2017 के बजट में उस वक्त के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पेश किया था। 29 जनवरी 2018 को केंद्र सरकार ने इसे नोटिफाई किया। ये एक तरह का प्रॉमिस्सरी नोट होता है। जिसे बैंक नोट भी कहते हैं। इसे कोई भी भारतीय नागरिक या कंपनी खरीद सकती है। अपने राजनैतिक लाभ के लिए भारतीय पटल पर उतारी गई चुनावी या इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम से सबसे ज्यादा लाभ भाजपा को हुआ है। गौर तलब हो कि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 15 फरवरी को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए केंद्र को चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया था। इसे असंवैधानिक करार देते हुए निर्वाचन आयोग को चंदा देने वालों, चंदे के रूप में दी गई राशि और प्राप्तकर्ताओं का खुलासा करने का आदेश दिया था।

मालूम हो कि एसबीआई इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने वाला अकेला अधिकृत बैंक है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में अप्रैल 2019 से लेकर अब तक खरीदे गए इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा देने के लिए कहा गया था। भारतीय स्टेट बैंक ने भारत की सर्वोच्च अदालत के आदेशानुसार निर्वाचन आयोग को इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ा जो डेटा प्रस्तुत किया उसके अनुसार बीजेपी सबसे ज्यादा चंदा हासिल करने वाली पार्टी बनकर सामने आई है। यही कारण रहा कि विपक्ष दलों के बिकाऊ संसद, विधायकों को खरीदने वाली भाजपा ने कई राज्यों में कमल खिला डाला। लोकतंत्र की हत्या कर चुनी हुई सरकारों को गिराने वाली मोदी नीत राजग ने पूरे देश में विपक्ष को पंगु बना दिया और धन के लालच में अपना ज़मीर बैंचने वालों ने खूब धन पीटा। पार्टी बदली और लाभ उठाया। भारतीय स्टेट बैंक द्वारा दी गई जानकारी अनुसार इस रिपोर्ट को दो हिस्सों में जारी किया गया है। पहले हिस्से में 336 पत्रों में उन कंपनियों के नाम हैं जिन्होंने इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदा है और उसकी राशि की जानकारी भी दी गई है।

जबकि दूसरे हिस्से में 426 फरों में राजनीतिक दलों के नाम हैं। और उन्होंने कब कितनी राशि के इलेक्टोरल बॉन्ड कैश कराए उसकी विस्तृत जानकारी है। डेटा अप्रैल 2019 से लेकर जनवरी 2024 तक का है। लेकिन मार्च 2018 से मार्च 2019 तक का डेटा गायब है जबकि इस बीच चुनावी बॉन्ड की बिक्री 2500 करोड़ रुपये से अधिक थी। इस बीच चंदा किसने दिया और चंदा किसको मिला? और यह डेटा सार्वजनिक रूप से गायब क्यों है? इस पर तत्काल स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। डाटा गायब होना बहुत सारे प्रश्नों को जन्म देता है। यह जानकारी सत्ता धारी भाजपा के काले पतित चेहरे को उजागर करती है कि किस प्रकार विपक्ष को समाप्त कर एक छत्र शासन चलाने की भाजपा की मुहिम में चुनावी बॉन्ड योजना कारगर साबित हुई है।

भारत में ‘लोकतंत्र’ की खस्ताहाल चुनावी स्थिति का आकलन करते समय ये डिटेल्स आश्चर्यजनक और दिमाग सुन्न कर देने वाले हैं। यह राजनीतिक पार्टियों, विशेषकर सत्ताधारी पार्टी के आचरण में लोकतांत्रिक नैतिकता के व्यापक पतन को दर्शाता है। यह स्वीकार करना आवश्यक है कि राजनीतिक फंडिंग में भाजपा का प्रभुत्व उसकी चुनावी सफलता और लोकप्रियता का प्रतिबिंब है। हालांकि, इसे एक जीवंत और प्रभावी विपक्ष की आवश्यकता पर हावी नहीं होना चाहिए। इमरजेंसी और गठबंधन की राजनीति के दौर में ऐतिहासिक प्रसंगों से मिले सबक, राष्ट्र के लोकतांत्रिक ढांचे की सुरक्षा के लिए नियंत्रण और संतुलन के महत्व को रेखांकित करते हैं।

आने वाले दिनों में चुनावी बॉन्ड योजना भाजपा को और किस प्रकार नंगा करती है और इस ऐतिहासिक घोटाले की आग से विपक्ष को कितना लाभ होगा यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन बात पूर्णतः उजागर हो गई है कि सत्ता की भूख मिटाने वाली भाजपा ने किस प्रकार विपक्ष को कमज़ोर किया है। और चुनावी बॉन्ड स्कीम का भरपूर लाभ प्राप्त कर खुद को मज़बूत बनाया है। 2014 में सत्ता हासिल करने के लिए काले धन को स्विस बैंक से लाने वाली भाजपा अब एसबीआई से अपने काले पतित चेहरे को छिपाने की भरपूर कोशिश में लगी है। काला धन उजागर करने वालों के काले चेहरे सामने आ चुके हैं। ऐसे में जनता को जागृत होकर इनकी सच्चाई को स्वीकार करना होगा, अन्यथा धर्म के नाम की अफीम चटाने वाले जनता से उसके हाथ का निवाला तक छीन लेंगे।

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