मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

कोलकाता पश्चिम बंगाल स्थित मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में रीजनल डायरेक्टर के पद पर पदस्थ उर्दू के प्रख्यात शायर, साहित्यकार एवं पत्रकार इमाम आज़म के इंतेक़ाल (निधन), गुलबर्गा कर्नाटक के डॉक्टर खलील मुजाहिद के इंतेक़ाल की खबर के बाद एक और बेहद अफसोसनाक ख़बर सामने आई है। भारत के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उर्दू पत्रकार एवं लेखक आली जनाब मासूम मुरादाबाद से प्राप्त जानकारी के अनुसार एवं भारत के प्रसिद्ध उर्दू पत्रकार असलम फरशूरी और भारत की प्रसिद्ध उर्दू लेखिका मोहतरमा शबीना फरशुरी के हलक़ा ए एहबाब में यह खबर बड़े दुख के साथ पढ़ी और सुनी जाएगी के प्रसिद्ध शायर, अदीब और उस्ताद प्रोफ़ेसर अनवर मोअज्जम (94) का शनिवार की दोपहर हैदराबाद में इंतेक़ाल हो गया। वे भारत प्रसिद्ध उर्दू लेखिका शबीना फरशूरी के बहनोई थे। उनका असली नाम अनवर अली खान था और वे 1929 में बिहार के औरंगाबाद जिले में पैदा हुए थे। वे उर्दू की प्रसिद्ध कहानीकार पद्म श्री जिलानी बानो के पति थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया उस्मानिया हैदराबाद से उनका छात्र और उस्ताद (शिक्षक) दोनों का संबंध था। वे उस्मानिया विश्वविद्यालय के इस्लामी अध्ययन विभाग के पूर्व प्रमुख थे। उनकी पहली किताब “आसारे जमाल उद्दीन अफगानी” 1956 में अलीगढ़ से उस समय प्रकाशित हुई थी, जब वे वहाँ पीएचडी के छात्र थे। बाद में यह किताब अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुई। 2019 में “गालिब की फिक्री वाबस्तगियाँ” नाम से उर्दू और अंग्रेजी में प्रकाशित हुई उनकी किताब को खास मकबूलियत हासिल हुई थी। उर्दू साहित्य, इस्लामिक अध्ययन और मुस्लिम समाज पर उनका अध्ययन बहुत व्यापक था। कविता और शायरी के क्षेत्र में भी उनकी विशेष पहचान थी। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने एकांत जीवन बिताया और खुद को शैक्षिक और साहित्यिक कार्यों तक सीमित रखा। अल्लाह करीम मरहूम की बख्शीश और मगफिरत फरमाए और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला से आला मक़ाम अता फरमाए। उनके दो शेर अवलोकन कीजिए: (1) आओ देखें ऐहले वफ़ा की होती है तौकीर कहां। किस महफिल का नाम है मकतल, खींचती है शमशेर कहां। (2) आंखों में घुल न जाए कहीं जुल्मतों के रंग। जिस सिम्त रोशनी है उधर देखते रहो।
