अरशद आब्दी, ब्यूरो चीफ, झांसी (यूपी), NIT:

माहे रमजान की 19वीं तारीख़ की सुबह पैगंबर इस्लाम हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलेहे वसल्लम के दामाद और आपके खलीफा ए बरहक़ शीओं के पहले इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने दौरे हुकूमत में सुबह की नमाज़ के लिए घर से निकल कर मस्जिद पहुंचे जहां आप का दुश्मन इब्ने मुलजिमे मुरादी ने ज़हर में बुझाई हुई तलवार लिए हुए पहले से लेटा हुआ था इमाम ने उसे नमाज के लिए उठाया और खुद मुसल्ला ए इबादत पर जाकर नमाज़ में मशग़ूल हो गए. अभी आपने आपने सिर को सजदे में रखा ही था कि इबिेने मुलजिम मुरादी की तलवार चल गई और आप का सिर ज़ख़मी हो गया और नमाज की मेहराब में आप अपने खून में नहा गए. आपके बड़े बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने नमाज मुकम्मल कराई और उसके बाद चादर में रखकर आपको आपके घर की तरफ ले जाया गया जहां 2 दिन तक बिसतरे बीमारी पर करवटें बदलने के बाद 21 रमजान की सुबह में आपकी शहादत हो गई.
हजरत अली अलैहिससलाम नबीए अकरम के बाद सबसे बड़े आलिम सबसे बड़े बहादुर सबसे ज्यादा दानी सबसे ज्यादा दयालु सबसे ज्यादा यतीमों व गरीबों और फ़क़ीरों का ख्याल रखने वाले इंसाफ पसंद आदिल रहनुमा और हाकिम थे. आपकी पूरी कोशिश रहती थी कि आप की जनता में कोई भी भूखा ना सोए इसीलिए रात के समय घर से निकल कर गरीब जनता को खाना पहुंचाते थे और खुद जौ की सूखी रोटी पर गुजारा करते थे. यहां तक कि आप अपनी पहचान भी नहीं बताते थे. आप की शहादत के बाद बहुत से लोगौं को मालूम हुआ कि उन को रोटियां पहुंचाने वाले हज़रत अली अलैहिससलाम थे.

हजरत अली अलैहिससलाम 13 रजब सन 30 आमुलफ़ील को खाना अ काबा में पैदा हुए. आप ने पैग़मरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहीे वसल्लम की गोद में परवरिश पाई. पूरे इस्लामी मिशन में आपके साथ रहे. मक्के की तन्हाई की जिंदगी में सबसे पहले इस्लाम का ऐलान करने वाले सबसे पहले नबी के पीछे नमाज़ पढ़ने वाले और हर लम्हा नबी के साथ रहने वाले आप ही थे. हिजरत की रात नबी के बिस्तर पर सो कर नबी की जान बचाने वाले आप ही थे और फिर मदीने की जिंदगी में मुसलसल जंगो़ं के दरमियान नबी अकरम के सबसे बड़े हामी और आपके मैदान-ए-जंग के सबसे बड़े बहादुर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ही थे आप को नबी ए अकरम ने आखिरी हज से वापस आते हुए अपने बाद अपना जानशीन बनाया था. आप ने हकूमत से दूर कर दिये जाने के बावजूद अपनी ज़िममेदारी को अचछी तरह अदा किया. आज सचचा दयालु सबका भला चाहने वाला असली इसलाम आप के पैग़ामात में ही ज़िनदा है.
ऱमज़ान के नहीने मे 19 तारीख की युबह हज़रत अली के चाहने वाले उनके सोग मे ताबूत को चादर में रख कर मसजिद से जुलूस निकालते हैं दुनिया के बहुत से शहरों की तरह झांसी में भी ये जुलूस विकाला जाता है. इसी तरह 21 रमज़ान शहादत के दिन भी सुबह और शाम को जुलूस निकाला जाता है जिस में आप की शहादत पर दुख जताने के साथ इस सब से पहले आतंकवादी हमले की निनदा की जाती है.
