अंकित तिवारी, ब्यूरो चीफ, प्रयागराज (यूपी), NIT:

महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा अमर शहीद राजेंद्रनाथ लाहिड़ी के बलिदान दिवस 17 दिसंबर से अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान दिवस तक ‘शहादत से शहादत तक’ शीर्षक से आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ गोरखपुर कारागार से किया गया।

कार्यक्रम के द्वितीय दिवस, 18 दिसंबर 2025 को अपराह्न 3:00 बजे अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान स्थल (पूर्व मलाका जेल परिसर), एस.आर.एन. हॉस्पिटल, प्रयागराज में एक विचार-विमर्श सत्र आयोजित किया गया। इसके पश्चात अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क तक मशाल जुलूस निकालकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मशाल सलामी क्रांतिकारी वंशज उत्तम कुमार बनर्जी के नेतृत्व में संपन्न हुई।

इस अवसर पर भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के विद्वान एवं महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राणा, विचारक अविनाश गुप्ता, गौतम कुमार बनर्जी एडवोकेट, विजेंद्र अग्रहरी, संजू चौधरी, सुनील यादव एडवोकेट, विजय मजूमदार एडवोकेट, सुदर्शनाचार्य जी महाराज, बबीता एडवोकेट, डॉ. प्रमोद शुक्ला, संतोष सिंह एडवोकेट, ओमप्रकाश शुक्ला, सपना एडवोकेट, पवन शंकर श्रीवास्तव, असीम मुखर्जी, रवि मोदक सहित अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
वक्ताओं ने कहा कि स्वतंत्र भारत में उसी शहर प्रयागराज में, जहां आज़ादी के महानायकों ने बलिदान दिया, आज शहादत स्थलों पर प्रवेश शुल्क वसूला जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जिस आज़ाद को फिरंगी हुकूमत कैद नहीं कर सकी, उस आज़ाद की शहादत स्थली पर आज देसी नौकरशाही द्वारा शुल्क लगाना जनता की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला है।
वक्ताओं ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज़ाद पार्क में छोटे-छोटे स्कूली बच्चों से भी प्रवेश शुल्क लिया जा रहा है। सरकार यदि पार्क के रखरखाव हेतु टिकट व्यवस्था करना चाहे तो कर सकती है, लेकिन शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा, प्रांगण और शहादत स्थल तक जाने के लिए शुल्क लेना पूरी तरह अनुचित है।
ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज़ाद की शहादत के बाद जनता ने उस जामुन के पेड़ की पूजा शुरू कर दी थी, जिसके पास उन्होंने स्वयं को बलिदान किया था।
अंग्रेजी शासन ने प्रेरणा के प्रसार को रोकने के लिए पहले उस पेड़ को कटवाया और फिर उसकी जड़ों तक को जलवा दिया, लेकिन फिर भी आज़ाद की चेतना को समाप्त नहीं कर सका। आज़ाद भारत में शहादत स्थलों पर शुल्क लगाना कहीं उसी इतिहास की पुनरावृत्ति तो नहीं है।
वक्ताओं ने कहा कि आज़ाद की शहादत स्थल पर वर्षों से मेले लगते रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि शुल्क व्यवस्था के कारण वे स्मृतियां और नई पीढ़ी का जुड़ाव समाप्त हो जाए। क्या अब शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए भी शुल्क देना पड़ेगा?
ठाकुर रोशन सिंह के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया कि उनका नाम ही नहीं, उनके विचार भी देश की नई पीढ़ी को रोशन करने वाले थे। फांसी से पूर्व मलाका जेल में लिखे गए उनके पत्र आज भी महुआ डाबर संग्रहालय में सुरक्षित हैं, जो उनके विचारों के सजीव प्रमाण हैं।
वक्ताओं ने बताया कि 19 दिसंबर 1927 को उनकी शहादत के दिन हजारों लोग उनका पार्थिव शरीर लेने जेल के बाहर एकत्र हुए थे। उनकी अंतिम यात्रा के ऐतिहासिक चित्र आज भी उस जनसैलाब और जनभावना की गवाही देते हैं।
अंत में वक्ताओं ने जोर देकर मांग की कि जिस मलाका जेल में अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई थी, वही स्थल आज एस.आर.एन. मेडिकल कॉलेज परिसर में समाहित है। ऐसे में आज़ादी के अमृत काल में एस.आर.एन. चिकित्सालय का नाम अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर किया जाना उनके बलिदान का सच्चा सम्मान होगा।

