हाथों और एक पैर के बिना जन्मी बच्ची फातिमा: देवलापुर की रोशनी ने गर्व से चुना जीवन पथ | New India Times

जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:

हाथों और एक पैर के बिना जन्मी बच्ची फातिमा: देवलापुर की रोशनी ने गर्व से चुना जीवन पथ | New India Times

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के देवलापुर गांव में रोशनी नामक एक महिला ने 30 जून 2025 को एक ऐसी बच्ची को जन्म दिया,जिसके दोनों हाथ जन्मजात से ही नहीं हैं और दाहिने पैर का घुटना भी पूरी तरह विकसित नहीं है। इस बच्ची का नाम रोशनी ने (फातिमा) रखा है, जिसका अर्थ है ‘पैगंबर की बेटी’। यह घटना रायसेन के बेगमगंज सिविल अस्पताल में हुई, जहां रोशनी की पहली डिलीवरी थी। इस अनोखे मामले ने स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर काफी ध्यान आकर्षित किया है। जन्म और स्थिति: रोशनी ने 30 जून 2025 को बेगमगंज सिविल अस्पताल में बच्ची को जन्म दिया। बच्ची के दोनों हाथ कंधों से पूरी तरह अनुपस्थित हैं, और दाहिने पैर का घुटना अविकसित है।

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डॉक्टरों के अनुसार, मां और बच्ची दोनों डिलीवरी के बाद स्वस्थ हैं, लेकिन बच्ची को भविष्य में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। परिवार का निर्णय: प्रेग्नेंसी के छठवें महीने में अल्ट्रासाउंड के दौरान डॉक्टरों ने रोशनी और उनके परिवार को बच्ची की शारीरिक अक्षमता के बारे में सूचित कर दिया था। डॉक्टरों ने बताया कि बच्ची का जीवन कठिनाइयों से भरा हो सकता है। इसके बावजूद, रोशनी और उनके पति अरबाज खान ने बच्ची को जन्म देने का फैसला किया। रोशनी ने कहा, “मुझे पता था मेरी बेटी के हाथ नहीं होंगे, लेकिन मैंने कभी गर्भपात के बारे में नहीं सोचा। मेरे पति ने भी कहा कि हाथ नहीं हैं तो क्या, हमारे पास हैं, हम मेहनत करके उसे पालेंगे।

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परिवार और समाज की प्रतिक्रिया:
बच्ची के जन्म के बाद, उसे देखने के लिए अस्पताल में परिजनों, स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। बच्ची की सुंदरता ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया, लेकिन उसकी शारीरिक स्थिति को देखकर कई लोग भावुक भी हुए। सोशल मीडिया पर बच्ची का वीडियो वायरल हो गया, जिसने लोगों को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया।
गांधी मेडिकल कॉलेज की डीन और वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. कविता एन. सिंह ने बताया कि उनके 40 साल के करियर में ऐसे 4-5 मामले देखने को मिले हैं। उन्होंने कहा कि पहले अल्ट्रासाउंड तकनीक के अभाव में ऐसी स्थिति का पता गर्भावस्था के दौरान नहीं चल पाता था, लेकिन अब यह संभव है। बेगमगंज सिविल अस्पताल के सीबीएमओ डॉ. नितिन सिंह तोमर ने पुष्टि की कि रोशनी की यह पहली डिलीवरी थी और बच्ची स्वस्थ है, लेकिन उसकी शारीरिक स्थिति भविष्य में चुनौतियां पेश कर सकती है।

सामाजिक और चिकित्सकीय निहितार्थ:
यह मामला केवल एक चिकित्सकीय घटना नहीं है, बल्कि समाज के लिए भी एक विचारणीय विषय है। विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए सहायक और समावेशी वातावरण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। समाज, सरकार और संस्थाओं को मिलकर ऐसे बच्चों के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने की जरूरत है।

रोशनी का दृष्टिकोण:
रोशनी ने इस स्थिति को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। उनके चेहरे पर कोई तनाव नहीं दिखता, और वह अपनी बेटी फातिमा के प्रति गहरी ममता और विश्वास रखती हैं। उनके पति अरबाज, जो एक मजदूर हैं, ने भी इस निर्णय में उनका पूरा साथ दिया। रोशनी ने कहा कि वह हमेशा से बच्ची को जन्म देना चाहती थीं, और परिवार ने भी इस फैसले का समर्थन किया। यह घटना कुदरत के अनोखे खेल का एक उदाहरण है, जिसने न केवल रोशनी और उनके परिवार की हिम्मत और सकारात्मकता को दर्शाया, बल्कि समाज को विशेष जरूरतों वाले बच्चों के प्रति संवेदनशीलता और समावेशिता की आवश्यकता भी याद दिलाई। फातिमा की कहानी, हालांकि चुनौतियों से भरी हो सकती है, लेकिन उसकी मां रोशनी और परिवार का दृढ़ संकल्प उसे एक सशक्त भविष्य प्रदान करने की दिशा में एक प्रेरणा है।

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