24 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का गांव विकास से कोसों दूर, आजादी के दीवानों की जन्मस्थली बदहाली की कगार पर | New India Times

वी.के. त्रिवेदी, ब्यूरो चीफ, लखीमपुर खीरी (यूपी), NIT:

24 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का गांव विकास से कोसों दूर, आजादी के दीवानों की जन्मस्थली बदहाली की कगार पर | New India Times

खीरी जिले के बाॅकेगंज ब्लाक क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला नगरिया गांव स्वतंत्रता सेनानियों के नाम से जाना जाता है। इस गांव से निकले 24 स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन आज भी इस गांव में सेनानियों के परिवारों को ही सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा रही हैं। आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी यह गांव मूलभूत विकास के इंतजार में है। हालांकि यह महुरैना पंचायत के नगरिया गांव जो कि नगरिया वेटलेंड और पक्षी बिहार के नाम से जानने के साथ दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगलों से घिरा हुआ है। फिलहाल आजादी की लड़ाई में नगरिया गांव का इतिहास रहा है। देश को आजादी मिली छह दशक से ज्यादा समय बीत गया। लेकिन विकास के नाम पर यह गांव जीरो है। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर देश की आजादी के लिए चले विभिन्न आंदोलनों में सेनानियों ने अपनी अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन गांव की तस्वीर जनप्रतिनिधियों शासन-प्रशासन की अपेक्षा बयां कर रही हैं। 24 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों वाला प्रदेश में शायद ही कोई दूसरा गांव हो पर किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की याद में यहां कोई स्मृति शेष नहीं है। गांव के सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की थी। दुधवा टाइगर रिजर्व कि जंगलों से घिरा यह नगरिया गांव ने 24 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दिए। जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जन्मस्थली शासन- प्रशासन व जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण तमाम अव्यवस्थाओं और अभावों से जूझ रही है। तो वही ब्लाक क्षेत्र में जगह- जगह अमृत महोत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. इस दौरान लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते लेकिन आजादी के दीवानों के परिवारों के सदस्यों को बुलाया तक नहीं जाता है। लोगों का कहना है कि आज तक उनका हाल जानने के लिए गांव में कोई नेता और जनप्रतिनिधि नहीं आया, केवल चुनाव के वक्त सिर्फ वोट मांगने आते हैं। नगरिया गांव में इन सपूतों की न तो प्रतिमा लगाई गई और न ही इन्हें राष्ट्रीय पर्व पर श्रद्घांजलि ही दी जाती है। लोग कहते हैं कि सच्चे राष्ट्रभक्त के स्वजनों को राजनीति से ओझल कर दिया गया है। कहते हैं कि वर्तमान में लोग धन, बल के भरोसे अपनी ही जनता पर राज करते हैं। ऐसे में इलाके के स्वतंत्रता सेनानी भूला दिए गए हैं। अब इनकी निगाहें सरकार पर हैं कि इन सेनानी और उनके स्वजनों को याद किया जाता है या उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। पवित्र जन्मस्थली का विकास कार्य कराए जाने को लेकर प्रशासन ने ध्यान देना उचित नहीं समझा। जिससे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जन्मस्थली आज भी बदहाली का शिकार है। और भारत मां के वीर सपूतों की याद में नगरिया गांव में स्मारक स्थल बनवाने व सुन्दरीकरण कराने के लिए जनप्रतिनिधियों से लेकर शासन प्रशासन को पत्र लिखकर मांग करने के बावजूद भी दीवानों की जन्मस्थली विकास से कोसों दूर है।

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