Edited by Sabir Khan, NIT:
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराज
1. प्रस्तावना: एक ऐतिहासिक प्रश्न, जिसकी जाँच आवश्यक है
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित ककनमठ मंदिर मध्य भारत की उल्लेखनीय ऐतिहासिक और स्थापत्य धरोहरों में से एक है। इसकी स्थापत्य-विशेषताएँ, ऊँची पत्थर की संरचना और कलात्मक अवशेष लंबे समय से लोगों की जिज्ञासा का विषय रहे हैं। लेकिन इस स्मारक के संबंध में एक प्रश्न विशेष रूप से विचारणीय है—ककनमठ मंदिर के निर्माण से पहले इस स्थान पर क्या था?
मैं इस क्षेत्र में दो-तीन बार जा चुका हूँ। प्रत्येक यात्रा के दौरान मंदिर की संरचना और आसपास के ऐतिहासिक परिवेश को देखकर मेरे मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या इस स्थान का इतिहास केवल वर्तमान मंदिर के निर्माण-काल से शुरू होता है, या इसके नीचे और आसपास मानवीय गतिविधियों तथा पुराने निर्माणों की ऐसी परतें भी हो सकती हैं, जिनकी पर्याप्त जाँच अभी नहीं हुई है?
यह प्रश्न अपने आप में किसी पूर्ववर्ती बौद्ध विहार, स्तूप अथवा अन्य धार्मिक संरचना का प्रमाण नहीं है। इसका महत्त्व इस बात में है कि किसी स्मारक के निर्माण-काल की पहचान और उस स्थान के संपूर्ण इतिहास की पहचान दो अलग-अलग अनुसंधान-विषय हैं। वर्तमान मंदिर की तिथि ज्ञात होने पर भी यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उस स्थान पर उससे पहले कोई गतिविधि नहीं थी।
इस आलेख का उद्देश्य किसी पूर्वनिर्धारित धार्मिक निष्कर्ष को स्थापित करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्रोतों, क्षेत्रीय पुरातात्त्विक अध्ययनों और वैज्ञानिक जाँच की संभावनाओं के आधार पर इस प्रश्न को एक स्पष्ट अनुसंधान-कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत करना है।
2. एक रात में मंदिर निर्माण की किंवदंती और मानवीय श्रम का प्रश्न
ककनमठ मंदिर के संबंध में एक किंवदंती सुनने को मिलती है कि देवताओं ने इस मंदिर का निर्माण केवल एक रात में कर दिया और किसी को इसकी जानकारी तक नहीं हुई। ऐसी लोककथाएँ प्राचीन स्थापत्य की भव्यता, असाधारण शिल्प-कौशल और उसके निर्माण को लेकर समाज में विद्यमान विस्मय को व्यक्त करती हैं। किंतु इस किंवदंती की ऐतिहासिक सत्यता निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक हैं। इसे फिलहाल स्थानीय लोकविश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
मेरा मानना है कि किसी नवीन संरचना का उदय मनुष्य के विचार, श्रम, ज्ञान, अनुभव, तकनीक और सामूहिक प्रयासों से होता है। किसी मंदिर या अन्य ऐतिहासिक भवन के निर्माण में वास्तुकारों, शिल्पकारों, पत्थर तराशने वाले कारीगरों, निर्माण-कर्मियों, सामग्री जुटाने वालों और संरक्षण देने वाले लोगों की भूमिका रही होगी। उस समय उपलब्ध संसाधनों, औजारों, निर्माण-पद्धतियों और सामाजिक परिस्थितियों ने भी उसके स्वरूप को प्रभावित किया होगा।
इसलिए किसी भव्य संरचना को केवल चमत्कार के रूप में देखने के बजाय उसके पीछे निहित मानवीय प्रतिभा और श्रम को समझना आवश्यक है। प्राचीन निर्माणों की जटिलता और कलात्मक उत्कृष्टता मनुष्य की तकनीकी समझ, संगठन-क्षमता तथा सामूहिक सृजनशीलता का अध्ययन करने का अवसर देती है।
किसी निर्माण में दिखाई देने वाली अपूर्णता, असमानता अथवा अधूरापन भी अपने आप में किसी अलौकिक घटना का प्रमाण नहीं है। ऐसी विशेषताओं के पीछे निर्माण के अलग-अलग चरण, उपलब्ध संसाधनों की सीमाएँ, स्थापत्य-योजना में परिवर्तन, राजनीतिक या आर्थिक परिस्थितियाँ, प्राकृतिक क्षरण अथवा बाद के संरक्षण-कार्यों जैसे अनेक कारण हो सकते हैं। ककनमठ की किसी विशिष्ट स्थापत्य-विशेषता का कारण निर्धारित करने के लिए प्रत्यक्ष अध्ययन आवश्यक होगा।
इस दृष्टि से लोककिंवदंती को न तो उपहास का विषय बनाना चाहिए और न ही उसे ऐतिहासिक तथ्य मान लेना चाहिए। उसे स्थानीय सांस्कृतिक स्मृति के रूप में दर्ज करते हुए यह जाँचना अधिक उपयोगी होगा कि मंदिर की वास्तविक निर्माण-प्रक्रिया, स्थापत्य-तकनीक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में उपलब्ध प्रमाण क्या बताते हैं।
ककनमठ की महत्ता उसके निर्माण को चमत्कार मान लेने में नहीं, बल्कि उस मानवीय ज्ञान, श्रम और शिल्प-कौशल को समझने में है जिसने ऐसी स्थापत्य-कृति को संभव बनाया।
3. ककनमठ मंदिर: ज्ञात ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ककनमठ को सामान्यतः 11वीं शताब्दी के कच्छपघात शासक कीर्तिराज से संबंधित शिव मंदिर के रूप में पहचाना जाता है। सिहोनिया की प्राचीन पहचान को सिंहपानीय नाम से जोड़ा जाता है। ग्वालियर के सास-बहू मंदिर से संबंधित कच्छपघात अभिलेख और क्षेत्रीय ऐतिहासिक साहित्य इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं। कच्छपघातकालीन स्थापत्य पर माइकल डी. विलिस का अध्ययन भी उपयोगी संदर्भ प्रदान करता है।
यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वर्तमान मंदिर की पहचान और उसके निर्माण-काल को समझने में सहायक है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वर्तमान मंदिर से पहले उसी स्थान पर क्या था। इसके लिए मंदिर के निर्माण से संबंधित अभिलेखों के अतिरिक्त पुराने सर्वेक्षणों, स्थल के पुरातात्त्विक स्तरों, आसपास मिले अवशेषों और उनके मूल संदर्भों का अध्ययन आवश्यक है।
ककनमठ को केवल एक स्वतंत्र मंदिर के रूप में देखने के बजाय सिहोनिया के व्यापक ऐतिहासिक परिदृश्य के भीतर भी समझना चाहिए। क्षेत्र में मिले अन्य स्थापत्य-खंडों और प्रतिमाओं का दस्तावेजीकरण इस दिशा में उपयोगी हो सकता है। हालाँकि, किसी प्रतिमा या स्थापत्य-खंड का वर्तमान स्थान ही उसका मूल स्थान सिद्ध नहीं करता। यह जाँचना आवश्यक है कि वह अपने मूल पुरातात्त्विक संदर्भ में मिला था या बाद में वहाँ लाया गया।
4. मुख्य शोध-समस्या: मंदिर से पहले का इतिहास
इस अनुसंधान की केंद्रीय समस्या यह है कि ककनमठ के निर्माण-पूर्व इतिहास को निर्धारित करने के लिए किस प्रकार के साक्ष्य आवश्यक हैं। इसके अंतर्गत तीन संभावनाओं को अलग-अलग जाँचना होगा।
पहली संभावना यह है कि वर्तमान मंदिर के निर्माण से पहले उसी स्थान पर कोई अन्य संरचना रही हो। दूसरी संभावना यह है कि आसपास किसी पुराने निर्माण की सामग्री का उपयोग वर्तमान मंदिर या उसके परिसर में हुआ हो। तीसरी संभावना यह है कि क्षेत्र में मिले कुछ अवशेष मूलतः किसी अन्य स्थान से संबंधित रहे हों और बाद में यहाँ पहुँचे हों।
इन संभावनाओं में से किसी एक को स्वीकार करने के लिए केवल स्थापत्य-समानता, स्थानीय परंपरा अथवा धार्मिक प्रतीक की सामान्य व्याख्या पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए अवशेषों का सटीक स्थान, निर्माण-तकनीक, शैलीगत विशेषताएँ, अभिलेखीय प्रमाण और जहाँ संभव हो, उनका पुरातात्त्विक संदर्भ आवश्यक होगा।
इसलिए मुख्य प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि ककनमठ के नीचे कोई विशेष धार्मिक संरचना अवश्य रही होगी, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या उपलब्ध साक्ष्य किसी निर्माण-पूर्व संरचना की मौजूदगी की पुष्टि करते हैं, और यदि करते हैं तो उसकी तिथि तथा सांस्कृतिक पहचान कैसे निर्धारित की जा सकती है?
5. शोध-पद्धति एवं अनुसंधान की रूपरेखा
यह आलेख उपलब्ध साहित्य की प्रारंभिक समीक्षा और आगे की जाँच के लिए प्रस्तावित पद्धति पर आधारित है। इसे पूर्ण पुरातात्त्विक सर्वेक्षण अथवा उत्खनन-रिपोर्ट नहीं माना जाना चाहिए। इसका उद्देश्य शोध-प्रश्नों को स्पष्ट करना, स्रोतों की पहचान करना और प्रमाणों के परीक्षण की प्रक्रिया निर्धारित करना है।
5.1 प्रमुख शोध-प्रश्न
अनुसंधान में निम्नलिखित प्रश्नों की जाँच की जानी चाहिए:
1. क्या ककनमठ के वर्तमान मंदिर-स्थल पर 11वीं शताब्दी से पहले मानवीय गतिविधि या किसी संरचना के प्रमाण उपलब्ध हैं?
2. क्या पुराने सर्वेक्षणों और पुरातत्त्व विभाग की रिपोर्टों में मंदिर के नीचे या आसपास मिले पूर्ववर्ती निर्माणों का उल्लेख है?
3. क्षेत्र में उपलब्ध मूर्तियों और स्थापत्य-खंडों का मूल स्थान, कालक्रम तथा सांस्कृतिक संबंध क्या है?
4. क्या सिहोनिया के व्यापक क्षेत्र में बौद्ध, जैन, शैव या अन्य परंपराओं से जुड़े ऐसे प्रमाण हैं, जिनकी ककनमठ के संदर्भ में तुलनात्मक जाँच उपयोगी हो सकती है?
5. क्या आधुनिक गैर-आक्रामक वैज्ञानिक तकनीकों से स्थल के नीचे संभावित संरचनाओं का पता लगाया जा सकता है?
5.2 ऐतिहासिक स्रोतों की समीक्षा
पहले चरण में अलेक्जेंडर कनिंघम की पुरातात्त्विक रिपोर्टों, ग्वालियर राज्य के पुरातत्त्व विभाग की वार्षिक रिपोर्टों, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अभिलेखों, जिला गजेटियरों, पुराने नक्शों, संग्रहालय अभिलेखों और प्रकाशित शोधपत्रों की व्यवस्थित समीक्षा की जानी चाहिए।
प्रत्येक स्रोत के लिए लेखक, प्रकाशन-वर्ष, संबंधित पृष्ठ, वर्णित स्थल और साक्ष्य का प्रकार दर्ज किया जाना चाहिए। मूल रिपोर्ट, अभिलेख या समकालीन चित्र को प्राथमिक स्रोत माना जाएगा। बाद में प्रकाशित शोधपत्रों को द्वितीयक स्रोत के रूप में देखा जाएगा। स्थानीय कथाओं और मौखिक परंपराओं को भी दर्ज किया जा सकता है, लेकिन स्वतंत्र पुष्टि के बिना उन्हें ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाएगा।
यदि किसी आधुनिक लेख में किसी प्रतिमा, भूमिगत संरचना या पुराने निर्माण का उल्लेख मिलता है, तो संबंधित मूल रिपोर्ट से उसकी पुष्टि की जानी चाहिए। मूल दस्तावेज उपलब्ध न होने की स्थिति में उस दावे को अपुष्ट बताना आवश्यक होगा।
5.3 स्थल-अध्ययन और दस्तावेजीकरण
अगले चरण में मंदिर, उसके आधार, आसपास के स्थापत्य-खंडों, संभावित सहायक संरचनाओं और क्षेत्र में दर्ज अन्य पुरातात्त्विक अवशेषों का व्यवस्थित सर्वेक्षण किया जाना चाहिए। प्रत्येक अवशेष की स्थिति, माप, निर्माण-सामग्री, स्थापत्य-विशेषताएँ और वर्तमान दशा दर्ज की जाए। उपलब्ध पुराने चित्रों तथा नक्शों की वर्तमान स्थल से तुलना करके यह भी जाँचा जाए कि संरक्षण या मरम्मत के दौरान किसी संरचना की स्थिति बदली है या नहीं।
प्रतिमाओं की पहचान करते समय केवल मुद्रा अथवा सामान्य आकृति के आधार पर धार्मिक निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए। प्रतीक-चिह्न, आसन, वस्त्र-विन्यास, प्रभामंडल, अभिलेख, मूर्तिकला-शैली और प्राप्ति-स्थल का संयुक्त अध्ययन आवश्यक होगा।
5.4 तुलनात्मक स्थापत्य एवं मूर्तिकला अध्ययन
सिहोनिया के अवशेषों की तुलना मध्य भारत के प्रमाणित बौद्ध, जैन और शैव स्थलों से की जा सकती है। इस तुलना में स्थापत्य-योजना, निर्माण-तकनीक, मूर्तिकला-शैली, अभिलेख और कालक्रम को प्रमुख आधार बनाया जाना चाहिए।
तुलनात्मक अध्ययन से किसी संभावित संबंध की पहचान हो सकती है, लेकिन केवल शैलीगत समानता से यह सिद्ध नहीं होता कि दो स्थल एक ही धार्मिक परंपरा के थे या एक ही काल में निर्मित हुए थे। निष्कर्षों को स्वतंत्र अभिलेखीय और पुरातात्त्विक प्रमाणों से पुष्ट करना होगा।
5.5 वैज्ञानिक परीक्षण और संभावित उत्खनन
यदि अभिलेखीय समीक्षा तथा स्थल-सर्वेक्षण से निर्माण-पूर्व संरचना के संकेत मिलते हैं, तो संबंधित पुरातात्त्विक प्राधिकरण की अनुमति से भू-भौतिकीय सर्वेक्षण पर विचार किया जा सकता है। स्थल की परिस्थितियों के अनुसार ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार, विद्युत प्रतिरोधकता सर्वेक्षण अथवा अन्य उपयुक्त तकनीकें भूमिगत असामान्यताओं की पहचान में मदद कर सकती हैं।
इन तकनीकों से प्राप्त संकेत अपने आप में किसी मंदिर, विहार या स्तूप का निर्णायक प्रमाण नहीं होंगे। उनकी व्याख्या विशेषज्ञों द्वारा की जानी चाहिए और आवश्यकता होने पर अन्य विधियों से पुष्टि करनी चाहिए।
उत्खनन तभी किया जाना चाहिए जब उपलब्ध साक्ष्य उसके औचित्य का समर्थन करें और सक्षम प्राधिकरण से विधिवत अनुमति प्राप्त हो। खुदाई में प्राप्त प्रत्येक वस्तु का सटीक स्थान, गहराई, परत और अन्य अवशेषों के साथ उसका संबंध दर्ज करना आवश्यक होगा।
5.6 निष्कर्षों की जाँच और सीमाएँ
प्रत्येक निष्कर्ष को उपलब्ध प्रमाणों की शक्ति के अनुसार वर्गीकृत किया जाना चाहिए:
– पुष्ट निष्कर्ष: मूल अभिलेख, सुरक्षित पुरातात्त्विक संदर्भ या अनेक स्वतंत्र साक्ष्यों से समर्थित।
– संभावित व्याख्या: कुछ साक्ष्यों से समर्थित, लेकिन अतिरिक्त पुष्टि की आवश्यकता वाली।
– अनसुलझा प्रश्न: जिसके लिए वर्तमान साक्ष्य अपर्याप्त हैं।
इस आलेख में ककनमठ के निर्माण-पूर्व स्तरों की प्रत्यक्ष जाँच, सभी संबंधित मूल रिपोर्टों का पृष्ठ-दर-पृष्ठ सत्यापन और किसी नए उत्खनन के परिणाम उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए किसी पूर्ववर्ती बौद्ध विहार, स्तूप अथवा अन्य धार्मिक संरचना की मौजूदगी के बारे में निर्णायक निष्कर्ष नहीं दिया जा सकता।
6. क्षेत्रीय बौद्ध पुरातत्त्व और ककनमठ का प्रश्न
ककनमठ के निर्माण-पूर्व इतिहास की जाँच करते समय आसपास के व्यापक क्षेत्र में बौद्ध पुरातात्त्विक अनुसंधान को देखना उपयोगी हो सकता है। इस संदर्भ में पूनम द्विवेदी का शोधपत्र “Exploration of Buddhist Remains in Shivpuri: A Review” उल्लेखनीय है। यह 2023 में Journal of History, Archaeology and Architecture में प्रकाशित हुआ और शिवपुरी क्षेत्र के बौद्ध अवशेषों तथा आगे के अन्वेषण की आवश्यकता की समीक्षा करता है।
इस अध्ययन का महत्त्व यह है कि यह क्षेत्रीय बौद्ध पुरातत्त्व को स्वतंत्र अनुसंधान-विषय के रूप में सामने लाता है। इससे यह प्रश्न उठाने का आधार मिलता है कि मध्य भारत के ऐतिहासिक स्थलों का अध्ययन करते समय केवल प्रसिद्ध स्मारकों तक सीमित रहने के बजाय आसपास के क्षेत्रों के अवशेषों और पुरातात्त्विक संदर्भों का भी व्यवस्थित सर्वेक्षण किया जाना चाहिए।
लेकिन शिवपुरी क्षेत्र में बौद्ध अवशेषों पर शोध उपलब्ध होने से ककनमठ के नीचे बौद्ध विहार या स्तूप होने की पुष्टि नहीं होती। दोनों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए सिहोनिया से प्राप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य आवश्यक होंगे। क्षेत्रीय समानता अनुसंधान की दिशा सुझा सकती है, पर वह किसी विशेष स्थल के इतिहास का विकल्प नहीं है।
इसलिए आगे के शोध में यह जाँचना चाहिए कि क्षेत्रीय अध्ययनों में सिहोनिया का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख, स्थल-मानचित्र, अभिलेख, प्रतिमा या अन्य प्रमाण मौजूद है या नहीं। यदि ऐसा प्रमाण मिलता है, तो उसके मूल स्रोत और संदर्भ की पुष्टि की जानी चाहिए।
7. सिहोनिया का व्यापक ऐतिहासिक परिदृश्य
किसी प्राचीन स्मारक का इतिहास केवल उसके मुख्य भवन से निर्धारित नहीं होता। आसपास के आवासीय क्षेत्र, जल-स्रोत, पुराने मार्ग, धार्मिक संरचनाएँ, शिलालेख और बिखरी निर्माण-सामग्री भी ऐतिहासिक परिदृश्य को समझने में सहायक हो सकते हैं।
इस दृष्टि से सिहोनिया के व्यापक क्षेत्र का सर्वेक्षण उपयोगी होगा। इसमें केवल ककनमठ परिसर नहीं, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों और पुराने नक्शों में दर्ज अन्य पुरातात्त्विक स्थलों को भी शामिल किया जाना चाहिए। क्षेत्र के अवशेषों का स्थानिक मानचित्र तैयार होने पर यह समझना आसान हो सकता है कि मंदिर किसी बड़े धार्मिक-सांस्कृतिक परिसर का हिस्सा था या आसपास की संरचनाएँ अलग-अलग कालों में विकसित हुईं।
हालाँकि, किसी क्षेत्र में अनेक धार्मिक परंपराओं के अवशेष मिलना अपने आप में धार्मिक उत्तराधिकार, संघर्ष या किसी एक परंपरा के दूसरी परंपरा पर आरोपण का प्रमाण नहीं है। ऐसे निष्कर्षों के लिए कालक्रम, संरचनात्मक संबंध और अभिलेखीय साक्ष्य आवश्यक हैं।
8. संरक्षण, पारदर्शिता और पुरातात्त्विक अभिलेखन
ककनमठ जैसे ऐतिहासिक स्मारक के अध्ययन में संरक्षण और दस्तावेजीकरण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यदि भविष्य में कोई सर्वेक्षण या उत्खनन किया जाता है, तो उसकी प्रक्रिया, स्थान-मानचित्र, तस्वीरें, प्राप्त वस्तुओं की सूची और निष्कर्षों का व्यवस्थित अभिलेखन किया जाना चाहिए।
यह सुझाव किसी अनियमितता की आशंका को तथ्य मानकर नहीं, बल्कि पुरातात्त्विक अनुसंधान के सामान्य मानकों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। पारदर्शी अभिलेखन से शोधकर्ताओं को पुराने और नए निष्कर्षों की तुलना करने तथा किसी दावे की स्वतंत्र समीक्षा करने का अवसर मिलता है।
बिना अनुमति खुदाई, अवशेषों को हटाना या उनकी मूल स्थिति का दस्तावेजीकरण किए बिना स्थान बदलना ऐतिहासिक जानकारी को स्थायी रूप से नष्ट कर सकता है। इसीलिए किसी भी भौतिक जाँच का संचालन संबंधित विशेषज्ञों और सक्षम पुरातात्त्विक संस्थाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए।
9. आगे के अनुसंधान की प्राथमिकताएँ
ककनमठ के निर्माण-पूर्व इतिहास की जाँच के लिए निम्नलिखित चरण अपनाए जा सकते हैं:
1. मूल स्रोतों का सत्यापन: कनिंघम की रिपोर्टों, पुराने पुरातत्त्व विभागीय अभिलेखों और संबंधित अभिलेखों के मूल पृष्ठों की जाँच।
2. स्थल और अवशेषों का दस्तावेजीकरण: वर्तमान मंदिर तथा आसपास के स्थापत्य-खंडों का माप, फोटोग्राफी और स्थान-मानचित्र।
3. क्षेत्रीय शोध का संकलन: सिहोनिया और निकटवर्ती क्षेत्रों पर प्रकाशित बौद्ध, जैन, शैव तथा अन्य पुरातात्त्विक अध्ययनों की समीक्षा।
4. गैर-आक्रामक वैज्ञानिक सर्वेक्षण: साक्ष्यों के आधार पर संभावित भूमिगत संरचनाओं की पहचान के लिए उपयुक्त तकनीकों का चयन।
5. आवश्यकता पर नियंत्रित उत्खनन: सक्षम प्राधिकरण की अनुमति और विशेषज्ञ निगरानी में, स्पष्ट शोध-प्रश्नों के साथ।
6. स्वतंत्र समीक्षा और प्रकाशन: निष्कर्षों, सीमाओं, चित्रों और स्रोतों को इस प्रकार प्रकाशित करना कि अन्य शोधकर्ता उनका परीक्षण कर सकें।
इन चरणों का उद्देश्य किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष तक पहुँचना नहीं, बल्कि यह निर्धारित करना है कि ककनमठ के निर्माण से पहले इस स्थान पर क्या था और उपलब्ध साक्ष्य उस प्रश्न का कितना विश्वसनीय उत्तर देते हैं।
10. निष्कर्ष: किंवदंती से जिज्ञासा और जिज्ञासा से प्रमाण तक
ककनमठ मंदिर का ज्ञात कच्छपघातकालीन इतिहास मध्य भारत की स्थापत्य परंपरा को समझने में महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ जुड़ी एक रात में देवताओं द्वारा मंदिर बनाए जाने की किंवदंती स्थानीय सांस्कृतिक स्मृति और स्मारक की भव्यता के प्रति लोगों के विस्मय को व्यक्त करती है। लेकिन ऐतिहासिक अनुसंधान के लिए लोककथा और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
मेरा दृष्टिकोण है कि किसी संरचना का निर्माण मनुष्य के विचार, श्रम, ज्ञान, तकनीक और सामूहिक प्रयासों से होता है। उसके स्वरूप में दिखाई देने वाली विशेषताओं या कमियों को भी तत्काल चमत्कार अथवा किसी एक कारण से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। उन्हें समझने के लिए निर्माण-प्रक्रिया, संसाधनों, स्थापत्य-तकनीक और ऐतिहासिक परिस्थितियों का अध्ययन करना होगा।
इसी प्रकार, वर्तमान मंदिर की ऐतिहासिक पहचान और उसके निर्माण-पूर्व स्थल-इतिहास को एक ही प्रश्न नहीं माना जाना चाहिए। क्षेत्रीय बौद्ध पुरातत्त्व पर उपलब्ध शोध व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करता है, लेकिन वर्तमान में उद्धृत सामग्री के आधार पर ककनमठ के नीचे किसी बौद्ध विहार या स्तूप की मौजूदगी की पुष्टि नहीं की जा सकती। इस प्रश्न का उत्तर मूल अभिलेखों की समीक्षा, स्थल-अध्ययन, अवशेषों के संदर्भ-विश्लेषण और आवश्यकता होने पर वैज्ञानिक सर्वेक्षण से ही प्राप्त किया जा सकता है।
मेरे लिए इस प्रश्न का महत्त्व किसी एक धार्मिक पहचान को स्थापित करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक जिज्ञासा को प्रमाण-आधारित अनुसंधान में बदलना है। यदि ककनमठ के निर्माण-पूर्व इतिहास की व्यवस्थित जाँच होती है, तो उससे न केवल इस स्मारक की समझ अधिक गहरी हो सकती है, बल्कि सिहोनिया के व्यापक ऐतिहासिक परिदृश्य को समझने के लिए भी नई सामग्री प्राप्त हो सकती है।
अंततः प्रश्न खुला है—ककनमठ के निर्माण से पहले इस स्थान पर क्या था? इसका उत्तर अनुमान अथवा किंवदंती से नहीं, बल्कि साक्ष्य, वैज्ञानिक परीक्षण और पारदर्शी अनुसंधान से ही दिया जाना चाहिए।
संदर्भ-सूची
1. Cunningham, Alexander. Four Reports Made During the Years 1862–63–64–65, Vol. II. सिहोनिया संबंधी विवरण के मूल पृष्ठों का प्रकाशन से पहले सत्यापन आवश्यक है।
2. Dwivedi, Poonam. “Exploration of Buddhist Remains in Shivpuri: A Review.” Journal of History, Archaeology and Architecture, Vol. 2, No. 2, 2023, pp. 219–226. https://www.pbjournals.com/jhaa/issue/75
3. Willis, Michael D. “Architecture in Central India under the Kacchapaghata Rulers.” South Asian Studies, Vol. 12, 1996. प्रकाशन-विवरण और पृष्ठ-संख्या का अंतिम सत्यापन आवश्यक है।
4. Gwalior State Archaeology Department. Annual Administration Reports, 1925–26 और 1926–27. संबंधित प्रतियों तथा सिहोनिया-विवरण की पुष्टि आवश्यक है।
5. Archaeological Survey of India. ककनमठ तथा संबंधित संरक्षित स्मारकों के उपलब्ध आधिकारिक विवरण और अभिलेख।
6. Morena District Administration. सिहोनिया क्षेत्र से संबंधित आधिकारिक जिला-स्तरीय विवरण।
7. सिहोनिया और मध्य भारत के पुरातात्त्विक स्थलों पर प्रकाशित अन्य सर्वेक्षण, अभिलेखीय अध्ययन और संग्रहालय सूचीपत्र—आगे की स्रोत-समीक्षा के लिए।
(लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर)

