किस आधार पर विकसित भारत की कल्पना? जातिवाद, असमान शिक्षा और सामाजिक न्याय के बजट पर धरातलीय कार्य की आवश्यकता | New India Times

Edited by Sabir Khan, NIT:

लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे

शोध-सार: विकसित भारत की कल्पना को केवल आर्थिक वृद्धि, आधुनिक तकनीक, आधारभूत संरचना, घोषणाओं और प्रचार तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसकी वास्तविक कसौटी सामाजिक समानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जातिगत भेदभाव में कमी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आर्थिक अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण और वंचित समुदायों के लिए निर्धारित संसाधनों का उद्देश्यपूर्ण उपयोग है। प्रस्तुत शोध लेख इस प्रश्न का विश्लेषण करता है कि जब समाज में जातिवाद, अंधविश्वास, रूढ़िवाद, शैक्षिक असमानता और पीढ़ीगत आर्थिक विषमता जैसी चुनौतियाँ मौजूद हों, तब विकास के दावों को किन आधारों पर परखा जाना चाहिए। इसमें अनुसूचित जाति घटक (SCSP) और जनजातीय उपयोजना (TSP) की राशि के उपयोग, सार्वजनिक जवाबदेही तथा योजनाओं के वास्तविक परिणामों की समीक्षा की आवश्यकता पर भी विचार किया गया है। लेख का केंद्रीय तर्क है कि विकास की सफलता नारों से नहीं, बल्कि धरातल पर होने वाले मापने योग्य सामाजिक परिवर्तन से निर्धारित होनी चाहिए।

प्रमुख शब्द: विकसित भारत, सामाजिक न्याय, जातिवाद, समान शिक्षा, अंधविश्वास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, SCSP, TSP, बजटीय जवाबदेही, समान अवसर, समावेशी विकास।

1. प्रस्तावना: विकास के दावों की सामाजिक कसौटी

विकसित भारत का सपना प्रत्येक नागरिक के लिए बेहतर जीवन, सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा की आशा लेकर आता है। यह एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय लक्ष्य है, लेकिन इसकी सार्थकता का मूल्यांकन केवल आर्थिक उपलब्धियों, बड़ी परियोजनाओं, डिजिटल सुविधाओं या आधुनिक निर्माण कार्यों के आधार पर नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि इन उपलब्धियों से समाज के विभिन्न वर्गों के जीवन में कितना वास्तविक परिवर्तन आया है।

यदि देश में आधुनिक तकनीक का विस्तार हो, लेकिन गरीब परिवार का बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रहे; यदि समानता की घोषणा हो, लेकिन जातिगत भेदभाव सामाजिक व्यवहार में दिखाई देता रहे; यदि सामाजिक न्याय की योजनाएँ बनें, लेकिन उनके लाभों का पारदर्शी विवरण उपलब्ध न हो, तो विकास की अवधारणा की गंभीर समीक्षा आवश्यक है।

इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक वृद्धि, तकनीकी विकास या आधारभूत संरचना का कोई महत्त्व नहीं है। ये सभी आवश्यक हैं। प्रश्न यह है कि क्या इन उपलब्धियों के साथ सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा को भी समान प्राथमिकता मिल रही है?

विकास का मूल्यांकन नागरिकों के वास्तविक अनुभवों से होना चाहिए। किसी गाँव में विद्यालय की स्थिति, किसी बस्ती में पेयजल की उपलब्धता, गरीब परिवार के बच्चे की सीखने की क्षमता, भेदभाव की शिकायत पर कार्रवाई और सरकारी बजट से प्राप्त वास्तविक लाभ—ये सभी विकास की धरातलीय तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

इसलिए मूल प्रश्न है: यदि विकास का दावा व्यापक है, तो उसके लाभ भी समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचाने के लिए ठोस कार्य कितने व्यापक हैं?

2. जातिवाद: संवैधानिक आदर्श और सामाजिक व्यवहार के बीच अंतर

भारतीय संविधान समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा के आदर्शों पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करता है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण से संबंधित है। अनुच्छेद 15 कुछ आधारों पर भेदभाव के निषेध का प्रावधान करता है, जबकि अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और उसके किसी भी रूप में आचरण को निषिद्ध करता है।

इन संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद सामाजिक समानता अपने आप स्थापित नहीं हो जाती। इसके लिए सामाजिक व्यवहार, संस्थागत व्यवस्था, शिक्षा और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन में निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।

जातिवाद का प्रभाव सामाजिक संबंधों, विवाह, सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच, रोजगार के अवसरों और व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा पर पड़ सकता है। इसकी प्रकृति और तीव्रता अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती है; इसलिए इसके अध्ययन में प्रमाण, क्षेत्रीय परिस्थितियाँ और प्रभावित लोगों के अनुभव महत्त्वपूर्ण हैं।

किसी बच्चे की प्रतिभा का आकलन उसके जन्म या सामाजिक पहचान के आधार पर नहीं होना चाहिए। प्रत्येक बच्चे को ऐसी परिस्थितियाँ मिलनी चाहिए जिनमें वह अपनी क्षमता विकसित कर सके। यदि किसी व्यक्ति को जातिगत पहचान के कारण अवसरों, सम्मान या अधिकारों से वंचित किया जाता है, तो यह समानता के संवैधानिक आदर्श के विपरीत है।

जातिगत भेदभाव समाप्त करने के लिए केवल सामाजिक सद्भाव की अपील पर्याप्त नहीं है। भेदभाव से संबंधित शिकायतों की निष्पक्ष जाँच, पीड़ितों की सुरक्षा, कानून के अनुसार कार्रवाई, विद्यालयों में समान व्यवहार और सार्वजनिक संस्थाओं में जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।

विकसित भारत की पहचान ऐसी व्यवस्था से होनी चाहिए जिसमें व्यक्ति का सम्मान उसकी जाति या पारिवारिक पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उसके समान नागरिक अधिकारों और मानवीय गरिमा से निर्धारित हो।

3. अंधविश्वास और रूढ़िवाद: वैज्ञानिक दृष्टिकोण की भूमिका

समाज का विकास केवल बाहरी संरचनाओं के निर्माण से नहीं, बल्कि विचार करने की क्षमता और ज्ञान के प्रति दृष्टिकोण से भी जुड़ा होता है। अंधविश्वास और रूढ़िवाद तब विकास में बाधा बनते हैं, जब अप्रमाणित धारणाओं को प्रश्नों से परे मान लिया जाता है, तर्कपूर्ण संवाद को रोका जाता है या परंपरा के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को सीमित किया जाता है।

यहाँ यह अंतर समझना आवश्यक है कि हर परंपरा अंधविश्वास नहीं होती और प्रत्येक सांस्कृतिक आस्था वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विरुद्ध नहीं होती। भारतीय ज्ञान परंपरा में तर्क, दर्शन, वाद-विवाद, निरीक्षण और विभिन्न वैचारिक धाराओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। किसी परंपरा का मूल्यांकन उसके ऐतिहासिक संदर्भ, प्रमाणों और सामाजिक प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है प्रश्न पूछना, उपलब्ध प्रमाणों का परीक्षण करना, तार्किक निष्कर्ष निकालना और नए प्रमाण मिलने पर अपने विचारों में संशोधन करने के लिए तैयार रहना। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(h) में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद तथा ज्ञानार्जन और सुधार की भावना विकसित करना नागरिकों के मूल कर्तव्यों में शामिल है।

इस दिशा में विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। बच्चों को प्रश्न पूछने, प्रयोग करने, तथ्यों की जाँच करने और स्वतंत्र चिंतन के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। महिलाओं और वंचित समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण धारणाओं को भी तर्क, समानता और मानवीय गरिमा की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

विकसित भारत का अर्थ केवल तकनीक का उपयोग करना नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक चेतना विकसित करना भी है जो तकनीक के साथ विवेक, ज्ञान और मानवीय संवेदनशीलता को महत्त्व दे।

4. शिक्षा में असमानता: गरीब का बच्चा भी समान अवसर का अधिकारी

शिक्षा सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक उन्नति का प्रमुख साधन है। लेकिन शिक्षा की वास्तविक समानता का अर्थ केवल विद्यालय में प्रवेश मिल जाना नहीं है। इसका अर्थ है गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकें, डिजिटल संसाधन, सुरक्षित वातावरण, पर्याप्त मार्गदर्शन और आगे की शिक्षा के लिए वास्तविक अवसर उपलब्ध होना।

एक मंत्री, कलेक्टर, व्यवसायी या संपन्न परिवार के बच्चे को जिस स्तर के संसाधन और मार्गदर्शन की सुविधा मिलती है, गरीब परिवार के बच्चे को भी अपनी प्रतिभा विकसित करने का न्यायपूर्ण अवसर मिलना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी बच्चों को एक जैसा पेशा या समान परिणाम प्राप्त करने चाहिए। इसका अर्थ है कि किसी बच्चे का भविष्य केवल इसलिए सीमित न हो कि उसका परिवार निजी विद्यालय, महँगी कोचिंग, डिजिटल उपकरण या उच्च शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकता।

शिक्षा में समानता की चर्चा करते समय सीखने के वास्तविक परिणामों को देखना आवश्यक है। ASER Centre की Annual Status of Education Report (Rural) 2024 के अनुसार, ग्रामीण भारत के सरकारी विद्यालयों में कक्षा तीन के 23.4 प्रतिशत बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे। यह अनुपात 2022 में 16.3 प्रतिशत था। सुधार दर्ज हुआ, लेकिन बुनियादी पठन-कौशल को मजबूत करने की आवश्यकता भी स्पष्ट हुई। ये आँकड़े ग्रामीण भारत के सर्वेक्षण से संबंधित हैं, इन्हें देश के प्रत्येक विद्यालय की स्थिति नहीं माना जाना चाहिए।

इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा नीति का मूल्यांकन केवल विद्यालयों की संख्या, नामांकन या भवन निर्माण से नहीं, बल्कि बच्चों के सीखने के परिणामों से भी होना चाहिए।

इसके लिए सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता, नियमित शिक्षण, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, पोषण, डिजिटल पहुँच और अतिरिक्त शैक्षिक सहायता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा मार्गदर्शन और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अवसर बढ़ाने चाहिए।

गरीब परिवार के बच्चे को भी डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी, उद्यमी या किसी अन्य क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। किसी बच्चे की क्षमता का विकास उसके परिवार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर न रह जाए—यही शिक्षा में समान अवसर की वास्तविक कसौटी है।

5. कुछ परिवारों तक सीमित अवसर और पीढ़ीगत असमानता

समाज में उन्नति के अवसर हमेशा सभी परिवारों को समान रूप से उपलब्ध नहीं होते। जिन परिवारों के पास संपत्ति, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामाजिक संपर्क, आर्थिक सुरक्षा और मार्गदर्शन होता है, उनके बच्चों को आगे बढ़ने में कई सुविधाएँ मिल सकती हैं। इसके विपरीत, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को शिक्षा के साथ घरेलू जिम्मेदारियों, आजीविका और संसाधनों की कमी जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी संपन्न परिवार की सफलता अनुचित है या गरीब परिवार के बच्चे आगे नहीं बढ़ सकते। प्रश्न यह है कि क्या समाज में ऐसे अवसर पर्याप्त हैं जिनसे पिछली पीढ़ियों की वंचना अगली पीढ़ी का स्थायी भविष्य न बन जाए।

यदि कुछ परिवार बेहतर संसाधनों के कारण लगातार लाभ प्राप्त करते रहें और दूसरे परिवारों के बच्चे बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते रहें, तो अवसरों के वितरण की समीक्षा आवश्यक है।

समानता का अर्थ सभी लोगों को एक जैसा बना देना नहीं है। व्यक्तियों की क्षमताएँ, रुचियाँ और परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। समानता का अर्थ है कि सभी को सम्मान, अधिकार और अपनी क्षमता विकसित करने का न्यायपूर्ण अवसर मिले। जिन लोगों को ऐतिहासिक, सामाजिक या आर्थिक कारणों से अधिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है, उन्हें अतिरिक्त सहयोग देना भी अवसरों की समानता का हिस्सा है।

छात्रवृत्ति, सरकारी विद्यालयों को मजबूत करना, सार्वजनिक पुस्तकालय, डिजिटल शिक्षण, कौशल विकास, उच्च शिक्षा में सहायता और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण ऐसे साधन हैं जिनसे पीढ़ीगत असमानता कम की जा सकती है।

विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब सामाजिक उन्नति के अवसर केवल पहले से सक्षम परिवारों तक सीमित न रहें, बल्कि नए परिवारों और वंचित समुदायों के लिए भी खुलें।

6. SCSP/TSP की राशि: निर्धारित उद्देश्य और वास्तविक उपयोग

अनुसूचित जाति घटक (SCSP) और जनजातीय उपयोजना (TSP) की अवधारणा का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए बजटीय संसाधनों को निर्धारित करना तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाओं को आगे बढ़ाना रहा है। केंद्र सरकार की बजट व्यवस्था में इनसे संबंधित व्यवस्थाओं को क्रमशः Development Action Plan for Scheduled Castes (DAPSC) और Development Action Plan for Scheduled Tribes (DAPST) के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है। नीति आयोग के दिशा-निर्देशों में इन समुदायों के लिए बजट राशि निर्धारित करने की व्यवस्था का विवरण उपलब्ध है।

इस विषय में मूल प्रश्न यह है कि बजट में निर्धारित राशि का कितना हिस्सा लक्षित समुदायों की आवश्यकताओं के अनुरूप उपयोग हुआ और उससे कौन-से वास्तविक परिणाम प्राप्त हुए।

यदि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के विकास के लिए निर्धारित राशि का उपयोग ऐसे कार्यों में किया जाता है जिनका निर्धारित उद्देश्य से उचित संबंध नहीं है, या सामान्य व्यय को विशेष समुदायों के विकास की उपलब्धि के रूप में दिखाया जाता है, तो बजट की पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्न उठते हैं।

हालाँकि, प्रत्येक साझा सार्वजनिक सुविधा या सामान्य योजना को अपने आप अनुचित नहीं माना जा सकता। किसी योजना का मूल्यांकन लागू दिशा-निर्देशों, पात्रता मानदंडों, लक्षित लाभ, व्यय की प्रकृति और वास्तविक परिणामों के आधार पर होना चाहिए। ऐसी योजनाएँ जिनसे व्यापक आबादी के साथ लक्षित समुदायों को भी वास्तविक लाभ मिलता है, उनका आकलन भी प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए।

इसलिए SCSP/TSP के संदर्भ में केवल आरोप या अनुमान पर्याप्त नहीं हैं। प्रत्येक वित्तीय वर्ष और संबंधित सरकार के लिए निम्नलिखित विवरणों की समीक्षा आवश्यक है:

– निर्धारित बजट और वास्तविक आवंटन कितना था?
– कितनी राशि वास्तव में खर्च की गई और कितनी अप्रयुक्त रही?
– किस योजना और मद में व्यय किया गया?
– क्या व्यय संबंधित दिशा-निर्देशों और निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप था?
– लक्षित समुदायों को प्रत्यक्ष या प्रमाणित लाभ कितना मिला?
– लेखा-परीक्षण या निगरानी में कोई कमी सामने आई तो उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए?

भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के आधिकारिक पोर्टल पर DAPST/STC संबंधी दिशा-निर्देश और निगरानी रिपोर्ट उपलब्ध हैं। ऐसे स्रोतों के आधार पर बजटीय दावों का परीक्षण किया जा सकता है।

सामाजिक न्याय के लिए निर्धारित बजट केवल लेखांकन का विषय नहीं है। वह शिक्षा, आजीविका, बुनियादी सुविधाओं और अवसरों की कमी को दूर करने का साधन है। इसलिए निर्धारित उद्देश्य से असंगत खर्च के प्रमाण मिलने पर उसकी जाँच, सुधार और नियमानुसार जवाबदेही आवश्यक है।

7. नारों और प्रचार से आगे: धरातल पर कार्य की आवश्यकता

विकास की चर्चा में घोषणाएँ, सार्वजनिक संदेश और प्रचार योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुँचाने में उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन प्रचार स्वयं किसी योजना की सफलता का प्रमाण नहीं है। किसी कार्यक्रम का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके घोषित उद्देश्य कितने पूरे हुए और नागरिकों के जीवन में क्या परिवर्तन आया।

यदि शिक्षा सुधार का दावा किया जाता है, तो बच्चों के सीखने के परिणामों में सुधार दिखना चाहिए। यदि सामाजिक न्याय की बात की जाती है, तो भेदभाव के मामलों के निवारण, समान व्यवहार और संस्थागत जवाबदेही में प्रगति दिखाई देनी चाहिए। यदि वंचित समुदायों के विकास के लिए बजट निर्धारित है, तो उसके उपयोग और लाभ का स्पष्ट विवरण सामने आना चाहिए।

इसलिए विकास की समीक्षा में तीन स्तरों को अलग-अलग समझना आवश्यक है। पहला, सरकार या संस्था ने क्या लक्ष्य निर्धारित किया। दूसरा, उस लक्ष्य के लिए क्या कार्य किए गए। तीसरा, उन कार्यों से लोगों के जीवन में क्या वास्तविक परिणाम प्राप्त हुए।

किसी विद्यालय का निर्माण एक उपलब्धि है, लेकिन वहाँ नियमित शिक्षण और बच्चों के सीखने के परिणाम भी महत्त्वपूर्ण हैं। किसी योजना के लिए राशि आवंटित होना आवश्यक है, लेकिन उसके वास्तविक खर्च और लाभार्थियों तक पहुँच की पुष्टि भी जरूरी है। किसी सामाजिक अभियान का आयोजन उपयोगी हो सकता है, लेकिन उससे सामाजिक व्यवहार में क्या परिवर्तन आया, यह भी देखा जाना चाहिए।

विकास के नाम पर किए गए दावों की समीक्षा करना विकास-विरोध नहीं है। इसके विपरीत, प्रमाण-आधारित समीक्षा से योजनाओं की कमियों की पहचान होती है और सार्वजनिक संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव बनता है।

नारे रास्ता नहीं बनाते, काम बनाता है। घोषणाएँ समानता स्थापित नहीं करतीं, समान अवसर स्थापित करते हैं। प्रचार उपलब्धियों का परिचय दे सकता है, लेकिन उन उपलब्धियों की पुष्टि धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से ही होती है।

8. विकसित भारत के लिए ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना

विकसित भारत की सामाजिक अवधारणा को व्यावहारिक बनाने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं।

पहला—गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सुनिश्चितता: प्रत्येक सरकारी विद्यालय में शिक्षकों की उपलब्धता, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, सुरक्षित वातावरण, पेयजल और आवश्यक डिजिटल संसाधनों की समीक्षा की जाए। सीखने के परिणामों का नियमित आकलन हो तथा कमजोर विद्यार्थियों के लिए समयबद्ध सहायता उपलब्ध कराई जाए।

दूसरा—जातिगत भेदभाव के विरुद्ध जवाबदेही: शिकायत दर्ज कराने की सुलभ व्यवस्था, निष्पक्ष जाँच, पीड़ितों की सुरक्षा और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। विद्यालयों, कार्यस्थलों तथा सार्वजनिक संस्थाओं में समान व्यवहार के मानकों की निगरानी हो।

तीसरा—वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा: शिक्षा और सामाजिक संवाद में तर्क, प्रमाण, प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा को महत्त्व दिया जाए। अंधविश्वास तथा भेदभावपूर्ण धारणाओं का परीक्षण प्रमाण और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर किया जाए।

चौथा—SCSP/TSP बजट की पारदर्शिता: संबंधित सरकारें और विभाग बजट आवंटन, वास्तविक व्यय, योजना-वार विवरण और लक्षित लाभों की जानकारी सार्वजनिक करें। प्रमाणित अनियमितताओं पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा जाँच और नियमानुसार सुधारात्मक कार्रवाई की जाए।

पाँचवाँ—वंचित परिवारों के बच्चों के लिए अतिरिक्त सहयोग: छात्रवृत्ति, डिजिटल पहुँच, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, उच्च शिक्षा मार्गदर्शन और कौशल प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाए जाएँ। पात्रता तथा लाभ वितरण के मानदंड स्पष्ट और पारदर्शी हों।

छठा—परिणाम-आधारित मूल्यांकन: प्रत्येक प्रमुख योजना के लिए मापने योग्य लक्ष्य और समयसीमा तय की जाए। उदाहरण के लिए, विद्यालयों में सीखने के स्तर, छात्रवृत्ति वितरण, शिकायतों के निवारण और बजट उपयोग की नियमित प्रगति रिपोर्ट प्रकाशित हो।

सातवाँ—स्थानीय नागरिक भागीदारी: अभिभावकों, शिक्षकों, सामाजिक संस्थाओं, स्थानीय निकायों और समुदायों को योजनाओं की निगरानी में भागीदारी का अवसर मिले। सामाजिक अंकेक्षण और सार्वजनिक संवाद के माध्यम से स्थानीय समस्याओं की पहचान कर सुधार किया जाए।

नौवाँ—घोषणाओं और परिणामों के बीच सार्वजनिक जवाबदेही: किसी भी बड़े सामाजिक विकास कार्यक्रम के लिए घोषित लक्ष्य, खर्च की गई राशि, प्राप्त परिणाम और शेष कमियों का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। जहाँ लक्ष्य पूरे न हों, वहाँ सुधार की स्पष्ट कार्ययोजना और समयसीमा निर्धारित की जाए।

इन उपायों का उद्देश्य केवल योजनाओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनकी प्रभावशीलता और सामाजिक पहुँच में सुधार करना है।

9. निष्कर्ष: विकसित भारत की पहचान धरातल पर समानता से होगी

विकसित भारत की कल्पना तभी सार्थक होगी जब आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक न्याय, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समान अवसरों का विस्तार भी हो। जातिवाद, अंधविश्वास, रूढ़िवाद और पीढ़ीगत असमानता जैसी चुनौतियों का समाधान केवल घोषणाओं से नहीं होगा। इनके लिए निरंतर सामाजिक प्रयास, उत्तरदायी संस्थाएँ, प्रभावी नीतियाँ और प्रमाण-आधारित मूल्यांकन आवश्यक हैं।

गरीब परिवार का बच्चा भी अपनी प्रतिभा के आधार पर मंत्री, कलेक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक, उद्यमी या अपनी पसंद के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त कर सके। यह जरूरी नहीं कि सभी बच्चे एक जैसा परिणाम प्राप्त करें, लेकिन किसी बच्चे की संभावनाएँ उसकी जाति या आर्थिक स्थिति के कारण अनुचित रूप से सीमित नहीं होनी चाहिए।

इसी प्रकार SCSP/TSP के लिए निर्धारित राशि का उपयोग संबंधित दिशा-निर्देशों और लक्षित उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए। बजट की पारदर्शिता, वास्तविक लाभ का आकलन और प्रमाणित अनियमितताओं पर जवाबदेही सामाजिक न्याय को व्यावहारिक रूप देते हैं।

विकास का अर्थ केवल कुछ परिवारों की समृद्धि या आधुनिक निर्माण कार्यों का विस्तार नहीं है। इसका अर्थ उन परिस्थितियों का निर्माण भी है जिनमें अधिकाधिक नागरिक गरिमापूर्ण जीवन जी सकें, अपनी क्षमताओं का विकास कर सकें और सार्वजनिक संसाधनों से न्यायपूर्ण लाभ प्राप्त कर सकें।

विकसित भारत की वास्तविक कसौटी यह है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। नारे नहीं, धरातल पर काम चाहिए; केवल बजट आवंटन नहीं, उसके उद्देश्यपूर्ण उपयोग का प्रमाण चाहिए; केवल शिक्षा का अधिकार नहीं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के वास्तविक अवसर चाहिए। जब समानता भाषणों से आगे बढ़कर नागरिकों के जीवन में दिखाई देने लगेगी, तभी विकसित भारत की कल्पना सामाजिक न्याय के अर्थ में भी सार्थक होगी।

संदर्भ-सूची

1. भारत का संविधान, अनुच्छेद 14, 15, 17, 21A और 51A(h)। India Code, भारत सरकार। https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/19151/1/constitution_of_india.pdf
2. ASER Centre. Annual Status of Education Report (Rural) 2024. https://asercentre.org/aser-2024/
3. नीति आयोग. Guidelines for Earmarking of Funds for Development Action Plan for SCs and STs (DAPSC & DAPST), 2017. https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2023-05/Guidelines-for-SCSP-TSP-New-Arrangement-by-NITI-Aayog-2017.pdf
4. Ministry of Tribal Affairs, Government of India. Scheduled Tribe Component Monitoring System: Guidelines and Reports. https://tribal.gov.in/STCMonitoring.aspx
5. Ministry of Tribal Affairs, Government of India. Implementation of TSP Guidelines, प्रेस सूचना ब्यूरो, 2 अप्रैल 2026. https://www.pib.gov.in/newsite/erelcontent.aspx?lang=2&reg=48&relid=287402

(लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर)

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