बड़े निवेश प्रस्तावों के बीच MSME की अनदेखी क्यों? चीन की तर्ज पर सरकारी सहारा मिले तो MP में छोटे कारखानों को मिल सकती है नई उड़ान | New India Times

मुस्तफा हुसैन, भोपाल (मप्र), NIT:

बड़े निवेश प्रस्तावों के बीच MSME की अनदेखी क्यों? चीन की तर्ज पर सरकारी सहारा मिले तो MP में छोटे कारखानों को मिल सकती है नई उड़ान | New India Times

मध्य प्रदेश पर सार्वजनिक कर्ज का बोझ ₹4 लाख करोड़ के पार पहुंच चुका है और नियमित प्रशासनिक एवं कल्याणकारी खर्चों के लिए बाजार से लगातार नया कर्ज लिया जा रहा है। इसके बावजूद राज्य में औद्योगिकीकरण और विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है। राजधानी भोपाल के औद्योगिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार का पूरा ध्यान बड़े कॉर्पोरेट घरानों और निवेश प्रस्तावों (MoU) पर ही केंद्रित रहेगा, या स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने वाले छोटे कारखानों को भी बड़ा बनाने के लिए कोई ठोस नीति तैयार की जाएगी?

आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि मध्य प्रदेश सरकार चीन के ‘टाउनशिप मॉडल’ की तर्ज पर छोटे उद्योगों को संस्थागत सहयोग उपलब्ध कराए, तो प्रदेश के प्रत्येक जिले को उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

चीन का ‘वर्कशॉप मॉडल’ और MP की जमीनी स्थिति

भोपाल से वरिष्ठ पत्रकार मुस्तफा हुसैन की पड़ताल के अनुसार, चीन की औद्योगिक ताकत केवल भारी उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां बड़ी संख्या में छोटी घरेलू वर्कशॉप्स भी हैं, जिन्हें सरकारी सहयोग के माध्यम से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया गया है।

सस्ता कर्ज और वर्किंग कैपिटल: चीन में छोटी वर्कशॉप्स को आधुनिक मशीनरी और कच्चे माल के लिए कम ब्याज दरों पर पूंजी उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। इसके विपरीत, मध्य प्रदेश में छोटे उद्यमियों को बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए लंबी कागजी प्रक्रिया और कई बार जमानत या गिरवी संपत्ति जैसी शर्तों का सामना करना पड़ता है।

सप्लाई चेन और वेंडर नीति: चीन में बड़ी कंपनियों के लिए आवश्यक अनेक पुर्जे स्थानीय छोटी इकाइयों द्वारा तैयार किए जाते हैं। मध्य प्रदेश में पीथमपुर या मंडीदीप में स्थापित बड़े संयंत्रों के लिए कई कलपुर्जे दूसरे राज्यों या विदेशों से मंगाए जाते हैं। ऐसे में स्थानीय छोटे उद्योगों को बड़े उद्योगों की सप्लाई चेन से जोड़ने के लिए प्रभावी वेंडर लिंकेज नीति की जरूरत महसूस होती है।

साझा संसाधन (कॉमन फैसिलिटी): चीन के औद्योगिक क्षेत्रों में टेस्टिंग लैब, आधुनिक डिजाइन सेंटर और टूल रूम जैसी साझा सुविधाएं विकसित की जाती हैं। मध्य प्रदेश में कई छोटे कारखाने महंगी मशीनरी और आधुनिक तकनीकी सुविधाओं की कमी के कारण मानकीकरण एवं गुणवत्ता के मामले में पिछड़ जाते हैं।

बड़े निवेश बनाम छोटे कारखाने: नीतिगत प्राथमिकता का अंतर

पड़ताल के अनुसार, छोटे कारखानों की तुलना में बड़े निवेशकों की ओर अधिक ध्यान दिए जाने के पीछे कई व्यावहारिक कारण बताए जाते हैं।

प्रचार और हेडलाइन वैल्यू: हजारों करोड़ रुपये का एक बड़ा प्रोजेक्ट आसानी से मीडिया की सुर्खियां बन जाता है और राजनीतिक उपलब्धि के रूप में सामने आता है, जबकि सैकड़ों छोटी इकाइयों के विस्तार को उतना प्रचार नहीं मिल पाता।

कर संग्रह और प्रशासनिक सुविधा: बड़े संयंत्रों की संख्या सीमित होने के कारण उनके साथ प्रशासनिक स्तर पर संवाद और समन्वय अपेक्षाकृत आसान होता है, जबकि हजारों छोटे उद्यमियों की रोजमर्रा की प्रशासनिक एवं ढांचागत समस्याओं के समाधान के लिए अधिक व्यापक व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

इंस्पेक्टर राज की चुनौती: बड़े उद्योगों के पास कानूनी और विशेषज्ञ सलाह लेने के पर्याप्त संसाधन होते हैं, जबकि छोटे कारखाने प्रदूषण, श्रम और स्थानीय निकायों से जुड़ी विभिन्न स्वीकृतियों एवं प्रक्रियाओं की जटिलताओं से अधिक प्रभावित होते हैं।

डॉ. मोहन यादव सरकार की पहल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार ने औद्योगिक विकास को लेकर कई पहल की हैं।

विकेंद्रीकरण और रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव: निवेश को केवल भोपाल और इंदौर तक सीमित रखने के बजाय उज्जैन, जबलपुर, रीवा, ग्वालियर और सागर जैसे क्षेत्रों में रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव आयोजित कर स्थानीय संसाधनों, जैसे कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और खनिज आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।

प्लग एंड प्ले शेड्स: छोटे उद्यमियों को भूमि अधिग्रहण और निर्माण के शुरुआती खर्च से राहत देने के लिए तैयार औद्योगिक शेड्स और आसान शर्तों पर औद्योगिक स्थान उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

क्लस्टर विकास: फर्नीचर, खिलौना, रेडीमेड गारमेंट्स और फार्मा जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष क्लस्टर विकसित करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

जमीनी बदलाव के लिए जरूरी कदम

मुस्तफा हुसैन की रिपोर्ट के अनुसार, जब तक सरकार नीतिगत स्तर पर MSME क्षेत्र को आर्थिक विकास की प्रमुख शक्ति के रूप में प्राथमिकता नहीं देगी, तब तक छोटे उद्योगों के सामने मौजूद चुनौतियों का प्रभावी समाधान मुश्किल होगा। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं—

अनिवार्य स्थानीय खरीद: सरकारी खरीद और प्रदेश में स्थापित होने वाले बड़े उद्योगों को स्थानीय पंजीकृत छोटे कारखानों से न्यूनतम 25 से 30 प्रतिशत कच्चा माल या कलपुर्जे खरीदने के लिए प्रोत्साहित अथवा नीतिगत रूप से बाध्य करने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

सब्सिडी का समयबद्ध भुगतान: छोटे उद्योगों की लंबित कैपिटल सब्सिडी और बिजली संबंधी प्रोत्साहनों का समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि उद्यमियों की कार्यशील पूंजी प्रभावित न हो।

तकनीकी उन्नयन कोष: पारंपरिक वर्कशॉप्स को CNC मशीनों और ऑटोमेशन जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ने के लिए आसान वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

मध्य प्रदेश को यदि बढ़ते कर्ज के दबाव के बीच वास्तविक आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना है, तो विदेशी और बड़े निवेशकों के साथ-साथ राज्य की स्थानीय वर्कशॉप्स और MSME इकाइयों को भी औद्योगिक विकास की रीढ़ बनाना होगा। संभाग स्तर पर की जा रही घोषणाएं और निवेश प्रस्ताव धरातल पर छोटे कारखानों को कितना संबल देते हैं, इसी आधार पर सरकार की औद्योगिक नीति की वास्तविक सफलता का आकलन किया जा सकेगा।

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