नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ़, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:
महाराष्ट्र में सुखे से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। कपास सोयाबीन मकई दाल दलहन तमाम फसलें पानी के अभाव से ख़त्म हो चुकी है। इन सब के बावजूद सरकार में शामिल नेताओं ने राज्य में गणेश उत्सव धूमधाम से मनाने के लिए खूब चंदा दिया। शरद पवार के सक्रिय होने के बाद मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस को किसानों में जाना पड़ा। सुखे के मुआयने के नाम पर सरकार के मंत्री मध्यावधि चुनाव के भय से प्रचार मोड़ में चले गए हैं। जल तथा आपदा प्रबंधन विभाग का आधा आधा दफ़्तर संभाल रहे मंत्री गिरीश महाजन ने नासिक जलगांव में किसानों से संवाद किया। 2016 में भी सुखा था तब पूर्व मंत्री एकनाथ खडसे ने केंद्रीय कमेटी के साथ मिलकर केंद्र को पैकेज की तत्काल मांग की थी।

इस बार केंद्रीय कमेटी 5 अक्टूबर के बाद राज्य के सुखे का दौरा करने वाली है जिसके चलते राहत पैकेज का स्वरूप नाकाफी होगा। राहत पैकेज की पैकेजिंग का अधिकार गृह मंत्री अमित शाह के अधीन है। सरकारी तिजोरी पर दस लाख करोड़ रुपए का कर्ज़ होने के कारण महाराष्ट्र की वित्तीय शक्ति बेहद कमज़ोर हो चुकी है। मराठवाड़ा के आठ जिलों में अकाल की विभीषिका इतनी संवेदनशील है कि सरकार के मंत्री – विधायक जनता के बीच जाने से कतरा रहे हैं। नाजुक परिस्थिति में सारे दक्षिणपंथी संगठन भूमिगत हो गए हैं।
रेत तस्करी को ब्रेक की मांग :
जलगांव समेत पूरे महाराष्ट्र में खनिज माफियाओं ने प्रकृति को जबरदस्त तरीके से उजाड़ना तेज कर दिया है। डैमो की दिवारों के आगे बढ़ती सुखी नदियों और डैमो के बैक वॉटर में क्रेन से भारी मात्रा में रेत निकाली जा रही है। रातभर बिना नंबर के सैकड़ों डंपर हज़ारों ब्रास बालू की तस्करी कर रहे हैं। राजस्व विभाग से रेत की मांग करने पर बताया जाता है कि जब्ती कार्रवाई में मिली रेत से मांग पूरी की जाएगी लेकिन राजस्व विभाग की ओर से जब्ती कार्रवाई होती हि नहीं है। शहरों में खुलेआम आम बालू के डिपो लगाए जा रहे हैं। लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि सरकारी और निजी तमाम निर्माण कार्यों को रोककर पेयजल को सुरक्षित किया जाए।

