बीएयू का कृषि प्रसार सेवा ने कृषि नवाचार और किसानों की उन्नति के राह में हासिल किये नए मुकाम | New India TimesOplus_131072

अतीश दीपंकर, ब्यूरो चीफ, पटना (बिहार), NIT:

बीएयू का कृषि प्रसार सेवा ने कृषि नवाचार और किसानों की उन्नति के राह में हासिल किये नए मुकाम | New India Times

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर का कृषि प्रसार सेवा ने वर्ष 2024 में कृषि प्रसार के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छूते हुए उल्लेखनीय उपलब्धियाँ दर्ज की हैं।

विश्वविद्यालय के प्रसार सेवा ने किसानों की समृद्धि और आधुनिक कृषि तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए कई प्रभावशाली पहल की है।

कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह के कुशल नेतृत्व में यह संस्थान किसानों को सशक्त बनाने के अपने मिशन पर मजबूती से आगे बढ़ा है।

वर्ष 2024 की शुरुआत किसान मेले के भव्य आयोजन से हुई, जिसका विषय था “तकनीकी खेती से आत्मनिर्भर किसान”। इस मेले में 30,000 से अधिक किसानों ने भाग लिया और अपने अनुभवों तथा नवाचारों को साझा किया। इस आयोजन में 25 जिलों के उत्कृष्ट किसानों को सम्मानित किया गया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार और प्रगतिशील कृषि को बढ़ावा मिला।

विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय स्तर पर GIITAS-2024 (Grassroots Innovation and Innovators in Transforming Agri-food Systems) का आयोजन किया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में देशभर के 300 से अधिक नवाचारी किसानों ने भाग लिया और कृषि विकास के नवीन तरीकों पर चर्चा की। इस अवसर पर “उन्नत किसान: कृषि-खाद्य प्रणाली में नवाचार” विषय पर एक बहुभाषी पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसे किसानों के लिए एक उपयोगी मार्गदर्शिका के रूप में देखा गया।

कृषि वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के सहयोग से विश्वविद्यालय ने राज्य के 5620 हेक्टेयर कृषि भूमि पर फसल सुरक्षा तकनीकों का परीक्षण किया। साथ ही, 400 हेक्टेयर भूमि पर नमी संरक्षण के माध्यम से पैदावार में वृद्धि के प्रयास किए गए। बीज वितरण कार्यक्रम के तहत 2800 क्विंटल प्रमाणित बीज किसानों को उपलब्ध कराए गए, जिससे रबी फसल के उत्पादन में सुधार हुआ।

ड्रोन आज किसानों का नया साथी बन रहा है लेकिन बिहार के किसान इस आधुनिक तकनीक से खेती में थोड़े अनजान हैँ, इसी के मद्देनज़र विश्वविद्यालय ने “ड्रोन ऑपरेटर प्रशिक्षण कार्यक्रम” की शुरुआत की, जिसमें राज्य भर के युवाओं को प्रशिक्षित किया गया। ये प्रशिक्षित युवा अब ड्रोन तकनीक का उपयोग कर खेती को अधिक उत्पादक और कुशल बना रहे हैं। इस पहल ने कृषि में रोजगार के नए अवसर भी सृजित किए हैं।

जैविक उत्पाद स्वस्थ जीवन का आधार है, अतः जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा 356 बड़े मॉडल प्लॉट्स तैयार किए गए, जहां किसानों को जैविक कृषि की विधियों का प्रशिक्षण दिया गया। इसके अतिरिक्त, 134 किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को तकनीकी सहायता प्रदान की गई, जिससे स्थानीय स्तर पर उत्पादन और विपणन को मजबूती मिली।

मुख्यमंत्री विजन के अनुसार विश्वविद्यालय द्वारा चार हाईटेक कृषि ज्ञान वाहन बनाया गया जिसे राज्य भर में संचालित किए जा रहे हैँ , जो ग्रामीण क्षेत्रों में नवीनतम कृषि तकनीकों की जानकारी पहुँचा रहे हैं। इन वाहनों के माध्यम से किसानों को जागरूक किया जा रहा है और उन्हें आधुनिक उपकरणों के उपयोग का व्यावहारिक ज्ञान दिया जा रहा है।

इस वर्ष विश्वविद्यालय ने कौशल विकास कार्यक्रमों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। “किसान ड्रोन ऑपरेटर” और “कौशल विकास प्रशिक्षण” के तहत सैकड़ों युवाओं को प्रशिक्षित किया गया, जिन्होंने अब अपने ज्ञान को रोजगार और उत्पादन में बदलना शुरू कर दिया है।

कुलपति डॉ. सिंह ने प्रसार सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदानों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “हमारा लक्ष्य किसानों को आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक शोधों से जोड़कर उनकी उत्पादकता और आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय का कृषि प्रसार सेवा हमेशा किसानों की समृद्धि के लिए प्रतिबद्ध रहा है और आगे भी नवाचारों के माध्यम से कृषि को उन्नत बनाता रहेगा। हमारे ये प्रयास किसानों के विश्वास और सहभागिता का प्रमाण हैं।”

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, के प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ आर. के सोहाने कहते हैँ कि “वर्ष 2024 में हमने न केवल किसानों को तकनीकी रूप से सशक्त किया बल्कि कृषि प्रसारा के क्षेत्र में नवाचार के नए मानदंड भी स्थापित किए। विश्वविद्यालय भविष्य में भी कृषि के सतत विकास और किसान कल्याण की दिशा में कृषि प्रसार निदेशालय अपनी भूमिका निभाता रहेगा।”

कृषि प्रसार के क्षेत्र में ICT के प्रयोग में विश्वविद्यालय आज देश भर में सबसे उन्नत मॉडल विकसित किया है। किसान अब सोशल मीडिया और कृषि ज्ञान वाहनों के माध्यम से अपना सवाल-जवाब कर रहे हैँ, मीडिया सेंटर की बनायीं हुयी कृषि आधारित फ़िल्में किसानों के बीच जबरदस्त लोकप्रिय हुयी है। वहीं किसान समुदाय को सामुदायिक रेडियो से जोड़कर निरंतर कृषि प्रसार किया जा रहा है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय के एफएम ग्रीन से जुड़कर प्रसार करने के लिए कई संस्थाएं आगे आयी है।
इमरान उपलब्धियों के कारण ही बिहार कृषि विश्वविद्यालय के प्रसर मॉडल की चर्चा आज देश भर में सबसे उन्नत प्रसार मॉडल में होने लगी है।

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