नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

12 वीं सदी में उच्च वर्णीय सभ्यता की पहचान मानी जाती संस्कृत भाषा को दरकिनार कर बहुजनों के लिए मराठी भाषा में समतावादी साहित्य जैसे की लीला चरित्र और गीता का सार ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका) निर्माण करने वाले श्री चक्रधर स्वामी और संत श्री ज्ञानेश्वर ने महाराष्ट्र में समाजवाद की नींव रखी। इसी समाजवाद के विचार ने हमारे भारत को एक धर्मनिरपेक्ष संविधान दिया। राज्य में वारकरी सम्प्रदाय का इतिहास एक हजार साल पुराना है। आलंदी में संत ज्ञानेश्वर और देहु में संत तुकाराम महाराज की समाधी है।

New India Time’s ने संत ज्ञानेश्वर की संजीवन समाधी आलंदी का दौरा किया। समाधी मंदिर के मुख्य द्वार पर विठ्ठल भगवान की जगह पर गणेश की प्रतिमा है, ठीक पीछे इंद्रायणी नदी का बेजान प्रवाह अपने भीतर पूरे आलंदी का गंदा पानी लेकर आगे बढ़ता है, इसी में श्रद्धालु नहाते हैं। पिंडदान कर्मकांड जैसे वैदिक विधियों से निकलने वाला निर्मल दान नदी में बहाया जाता है। नदी के दोनों तटो को उत्तर भारत के हिन्दू धार्मिक स्थलों की तरह बनाया गया है।

हमें एक प्रसाधन गृह की दीवार पर कोनशिला मिली जिससे पता चला कि 2004 में दिवंगत प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई के करकमलों से भारत सरकार ने देहु आलंदी सासवड के लिए सांस्कृतिक मंत्रालय के फंड से सैकड़ों करोड़ रुपया दिया। 2004-2014 कांग्रेस सरकारों ने देहु आलंदी तीर्थ क्षेत्रों के विकास के लिए ढेला नहीं दिया। 2014-2024 देव देश धर्म की हिंदूवादी राजनीति करने वाली बीजेपी ने पुरोगामी विचारधारा के तीर्थ स्थलों की ओर जानबूझकर अनदेखी करी। खबर में हम जानकारी से अधिक फोटो का अधिक प्रयोग इसलिए कर रहे हैं ताकि पाठकों को गंभीरता का पता चले।

