नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ़, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

महाराष्ट्र विधानसभा के आखिरी मानसून सत्र का कामकाज कुछ ख़ास नहीं रहा। सदन के कामकाज पर जनता की जेब से 25 करोड़ रुपया खर्च हो गया। अंतरिम बजट मे शिंदे-फडणवीस सरकार की ओर से घोषित मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना के बारे में विपक्ष को आगामी विधानसभा चुनाव में होने वाले नफे नुकसान के मद्देनज़र बहस करनी पड़ी। कानून व्यवस्था से जुड़े संगीन ताजे मामलों पर कोई खुली चर्चा नहीं की गई। हम 20 जून 2024 को मंत्री गिरीश महाजन के गृह नगर जामनेर में पुलिस स्टेशन पर किए गए हमले की बात कर रहे हैं। इस पूरे मामले को पुलिस और सरकार की ओर से आदिवासियों की आक्रोशित भावनाओं का गलत दिशा निर्देशन करार देते हुए बड़ी सफ़ाई से दबा दिया गया।

दलित आदिवासियों की राजनीति करने वाली कांग्रेस पार्टी के विधायक सदन में खामोश रहे। कोई ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, कोई संवैधानिक चेतावनी, कोई तारांकित सवाल न्यायासन के अधिकार क्षेत्र में आने वाले किसी भी संवैधानिक प्रावधानों को प्रयोग में नहीं लाया गया। सदन के सामने सरकार को लिखित में तलब कर जवाब मांगा जाता है इस अधिकार के उपयोग को लेकर विपक्ष की ओर से कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं करी गई। विपक्ष की ऐसी कौन सी मजबूरी रही होगी जो जामनेर के मामले पर सदन के भीतर उसे सांप सूंघ गया। संसदीय लोकतंत्र में कानून बनाने वाली विधायिका में कानून व्यवस्था से संबंधित गंभीर मामलों पर विधायकों का चुप रहना समाज मे गलत संदेश प्रसारित करता है।

आज भाजपा विपक्ष में होती और यही घटना कांग्रेस के किसी मंत्री के गृह जिले में हो जाती तो भगवा पार्टी कानून व्यवस्था के नाम पर सड़क से लेकर सदन तक सरकार के छक्के छुड़ा देती। जवाब में सरकार गृह मंत्री के इस्तीफे से होने वाली अपनी बेइज्जती को टालने के लिए तत्काल जांच बिठाकर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करती नज़र आती। जामनेर थाना पथराव प्रकरण में पुलिस ने भीड़ को सामूहिक हिंसा फैलाने का आरोपी बनाकर कोर्ट के न्यायिक अधिकार में सौंप दिया है। सदन में सरकार बहरी विपक्ष गूंगा और मीडिया अंधी हो चुकी है। इस लिए गांधी जी के तीन बंदरों से मिलने वाली शिक्षा को हिंसा का विरोधी नहीं बल्की समर्थक घोषित कर दिया जाना चाहिए।
