अब्दुल वाहिद काकर, उदगीर/लातूर (महाराष्ट्र), NIT:

इंसान के लिए सबसे बड़ी जंग अपने नफ्स, इच्छाओं और आंतरिक बुराइयों से लड़ना है। जब तक व्यक्ति अपने नफ्स पर काबू पाना, दिल को बुराइयों से पाक करना और अल्लाह के जिक्र से अपने अंतर्मन को रोशन करना नहीं सीखता, तब तक उसकी आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है। अपने नफ्स का मुकाबला करना ही सबसे बड़ा जिहाद है। यह विचार प्रसिद्ध धर्मगुरु मुफ्ती फजील ने मदरसा काशिफ उलूम में आयोजित दो दिवसीय ‘मजलिस-ए-जिक्र व सुलूक’ की पहली सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
खतीब-ए-दकन हजरत मौलाना अब्दुल गफूर कुरैशी के उत्तराधिकारी हजरत मौलाना नूरुल हक की सरपरस्ती और हाफिज फुरकान की निगरानी में आयोजित इस मजलिस में बड़ी संख्या में साधकों, मदरसे के विद्यार्थियों और श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में आत्मशुद्धि, आत्मिक पवित्रता, अल्लाह के जिक्र तथा शरीयत और सुन्नत पर अमल करने के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला गया।
मुफ्ती फजील ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सबसे पहले अपनी आत्मशुद्धि की चिंता करनी चाहिए। अपने भीतर की कमियों और बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करने के लिए निरंतर प्रयास करना जरूरी है। अल्लाह और उसके रसूल (सल.) के आदेशों का पालन करते हुए जीवन को शरीयत और सुन्नत के अनुसार ढालना ही आध्यात्मिक साधना का वास्तविक उद्देश्य है। इसके लिए नफ्स की इच्छाओं पर नियंत्रण रखना और गलत आदतों से दूर रहना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि आत्मसुधार और आत्मसंयम कुछ दिनों का कार्य नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है। व्यक्ति को कभी यह नहीं समझना चाहिए कि उसकी आत्मशुद्धि पूरी हो चुकी है। हजरत इमाम अहमद बिन हंबल सहित अन्य बुजुर्गों के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महान बुजुर्गों ने भी जीवन के अंतिम समय तक इबादत, मेहनत और आत्मसुधार का सिलसिला जारी रखा।
दिल की बुराइयों से बचने के लिए जरूरी है अल्लाह का जिक्र
मुफ्ती फजील ने तकब्बुर, ईर्ष्या, पद और प्रतिष्ठा की लालसा तथा चुगली को दिल की बड़ी बीमारियां बताया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार शरीर की बीमारियों का इलाज जरूरी है, उसी प्रकार दिल और नफ्स की बुराइयों का उपचार भी आवश्यक है। इसके लिए नेक लोगों की संगत, आत्मसंयम और निरंतर अल्लाह का जिक्र करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईर्ष्या इंसान के नेक कर्मों को उसी तरह नष्ट कर देती है, जिस तरह आग सूखी लकड़ी को जलाकर राख कर देती है।
आत्मा की शुद्धि पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अनुचित इच्छाओं से बचकर अल्लाह की प्रसन्नता को अपने जीवन का उद्देश्य बनाना चाहिए। ज़िक्र के माध्यम से दिल और अंतर्मन को रोशन करना तथा अल्लाह की मोहब्बत के जरिए अपने भीतर की बुराइयों को दूर करना ही आध्यात्मिक सफर की बुनियाद है।
उन्होंने कहा कि शैतान के बहकावे से बचने के लिए इंसान को आखिरी सांस तक आत्मसुधार, इबादत और शरीयत व सुन्नत पर अमल करने का प्रयास जारी रखना चाहिए।

