मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:
उर्दू और हिंदी साहित्य की ख़िदमत, आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत को संजोने की अपनी 20 वर्षों पुरानी परंपरा को बरक़रार रखते हुए फ़नकार कल्चरल ग्रुप की ओर से दिल्ली की ग़ालिब अकादमी में मशहूर लेखक एवं साहित्यकार मरहूम नारंग साक़ी की याद में एक भव्य अखिल भारतीय मुशायरे का आयोजन किया गया। दिल्ली के वरिष्ठ शायर ख़ुमार देहलवी ने मुशायरे की अध्यक्षता की, जबकि ख़ुर्रम नूर उपाध्यक्ष के रूप में मौजूद रहे। यह साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम मरहूम नारंग साक़ी के जीवन, उनकी साहित्यिक सेवाओं और उनकी समृद्ध अदबी विरासत को समर्पित रहा।
मुशायरे के संयोजक एहतराम सिद्दीक़ी (जाहिल लखनवी) ने नारंग साक़ी को उर्दू-हिंदी शायरी का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए कहा कि उनके कलाम में इंसानियत, मोहब्बत और आपसी सद्भाव की ख़ूबसूरत झलक दिखाई देती है। उनकी साहित्यिक विरासत आज भी अदब से मोहब्बत करने वालों के दिलों में ज़िंदा है। उनकी याद में आयोजित यह मुशायरा साहित्य के प्रति सम्मान व्यक्त करने और उनकी यादों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की एक सार्थक कोशिश है।
इस यादगार मुशायरे में नारंग साक़ी के पुत्र संजीव नारंग सहित 40 से अधिक शायरों, शायराओं और साहित्यकारों ने शिरकत की। इनमें डॉ. अकील अहमद, सरफ़राज़ देहलवी, अफ़ज़ल मंगलोरी, प्रमोद शर्मा ‘असर’, शहादत अली निज़ामी, दर्द देहलवी, परवीन व्यास, हाशिम देहलवी, जावेद अब्बासी, सुरेंद्र ‘सिफ़र’, गोल्डी ‘ग़ज़ब’, आरिफ़ देहलवी, पवन तोमर, विवेक कविश्वर, पंडित प्रेम बरेलवी, नईम हिंदुस्तानी, कौसर परवीन कौसर, सरताज सबीना, कृष्णा दामिनी, रजनी बाला, पूजा भारद्वाज और निर्मल रचना सहित अनेक साहित्यकार शामिल रहे। सभी ने अपने कलाम और साहित्यिक प्रस्तुतियों के माध्यम से मरहूम नारंग साक़ी को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
मुशायरे का संचालन दिल्ली के मशहूर शायर असलम बेताब ने अपने ख़ूबसूरत, दिलकश और अनूठे अंदाज़ में किया। उनकी प्रभावशाली निज़ामत ने कार्यक्रम को साहित्यिक रंगों से सराबोर रखा और उपस्थित श्रोताओं को अंत तक बाँधे रखा।
ग़ौरतलब है कि फ़नकार कल्चरल ग्रुप पिछले 20 वर्षों से दिल्ली में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के ज़रिए अदब, शायरी और कला को बढ़ावा देने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। मरहूम नारंग साक़ी की याद में आयोजित यह अखिल भारतीय मुशायरा इसी समर्पित साहित्यिक परंपरा की एक और कड़ी साबित हुआ। इस आयोजन ने उनकी यादों और साहित्यिक योगदान को सम्मानपूर्वक फिर से ताज़ा कर दिया।

