मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, नई दिल्ली, NIT:
मौत एक ऐसी हक़ीक़त है, जिससे दुनिया का कोई इंसान इनकार नहीं कर सकता। क़ुरआन और अहादीस में भी स्पष्ट किया गया है कि हर जानदार को मौत का स्वाद चखना है। लेकिन जब किसी मां-बाप की आंखों के सामने उनका जवान बेटा इस दुनिया से रुख़सत हो जाए, तो यह सदमा उनके दिलों पर ऐसा गहरा ज़ख़्म छोड़ जाता है, जिसकी टीस उम्र भर महसूस होती रहती है। बेटे की जुदाई का दर्द शब्दों में बयान करना आसान नहीं, क्योंकि माता-पिता के लिए उनकी संतान केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि उनकी उम्मीदों, अरमानों और जीवन की खुशियों का केंद्र होती है।
करीब चालीस दिन पहले दिल्ली में हार्मनी पीस फाउंडेशन से जुड़े परिवार के साथ ऐसा ही दर्दनाक हादसा पेश आया, जब मरहूम मोहम्मद फ़ैज़ सैफ़ी अपने माता-पिता और चाहने वालों को ग़मगीन छोड़कर इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़सत हो गए। उनके इंतिक़ाल से परिवार, मित्रों, रिश्तेदारों और सामाजिक हलक़ों में शोक की लहर दौड़ गई।
इस कठिन घड़ी में परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। देश की कई प्रमुख राजनीतिक, सामाजिक और फ़िल्मी हस्तियों सहित अन्य क्षेत्रों की जानी-मानी शख्सियतों ने भी परिवार से मुलाक़ात कर अपना दुख साझा किया। इनमें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद, फ़िल्म जगत से जुड़ी एकता कपूर तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सहित कई प्रमुख हस्तियों के नाम शामिल हैं। इन हस्तियों और लोगों की मौजूदगी शोकाकुल परिवार के प्रति हमदर्दी और सामाजिक जुड़ाव की मिसाल बनी।
सैफ़ी पैलेस, दिल्ली में चालीसवें पर उमड़ा जनसैलाब
13 अक्टूबर 2026 को दिल्ली स्थित सैफ़ी पैलेस में मरहूम मोहम्मद फ़ैज़ सैफ़ी के चालीसवें के अवसर पर क़ुरआनख़्वानी और दुआ-ए-मग़फ़िरत का आयोजन किया गया। इस अवसर पर लगभग तीन हज़ार लोगों के शामिल होने का अनुमान बताया गया। उपस्थित लोगों ने मरहूम के लिए ईसाले सवाब किया और अल्लाह तआला की बारगाह में उनकी मग़फ़िरत, बुलंद दरजात तथा जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाने की दुआएं मांगीं।
इस आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि किसी प्रियजन की जुदाई के बाद भी उसके प्रति मोहब्बत, याद और दुआ का रिश्ता बरक़रार रहता है। लोगों की मौजूदगी ने ग़मज़दा परिवार को यह एहसास दिलाया कि इस मुश्किल घड़ी में समाज उनके साथ खड़ा है।
बागपत, जयपुर, अजमेर और टोंक सहित अनेक स्थानों पर हुई ईसाले सवाब की मजलिसें
मरहूम मोहम्मद फ़ैज़ सैफ़ी की याद में दुआ और ईसाले सवाब का सिलसिला दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले सहित देश के कई अन्य स्थानों पर भी उनके लिए विशेष मजलिसों का आयोजन किया गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ल्ड पीस हार्मनी (World Peace Harmony) के चेयरमैन हाजी शकील सैफ़ी साहब और ज़िला बागपत की टीम की ओर से मदरसा बरसिया, अमीनगर सराय, ज़िला बागपत में मरहूम मोहम्मद फ़ैज़ सैफ़ी के ईसाले सवाब और दुआ-ए-मग़फ़िरत के लिए मजलिस आयोजित की गई।
हाजी शकील सैफ़ी के परिवार से जुड़े जयपुर के पूर्व वरिष्ठ पार्षद एवं कांग्रेस नेता ज़ाकिर खान ने बताया कि जयपुर, टोंक और अजमेर सहित अनेक स्थानों पर लोगों ने मरहूम के प्रति अपनी मोहब्बत का इज़हार करते हुए क़ुरआनख़्वानी की और ईसाले सवाब किया।
हाजी शकील सैफ़ी के दिल्ली स्थित निवास पर दिल्ली इमाम संगठन के प्रमुख उमैर इलियासी साहब ने दुआ करवाई। मजलिस में मरहूम की मग़फ़िरत, बुलंद दरजात, क़ब्र को नूर से मुनव्वर किए जाने और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाने की दुआ की गई। साथ ही उनके तमाम अहले-ख़ाना के लिए सब्र-ए-जमील की दुआ भी मांगी गई।
इस अवसर पर मदरसे के बच्चों और उलमा-ए-किराम सहित कार्यक्रम में शामिल होने वाले सभी लोगों के लिए नाश्ते का इंतज़ाम भी किया गया। इस कार्यक्रम ने मरहूम के लिए ईसाले सवाब के साथ-साथ दीन की तालीम हासिल कर रहे बच्चों और उलमा-ए-किराम की ख़िदमत के जज़्बे को भी उजागर किया।
हाजी शकील सैफ़ी साहब और बागपत की टीम तथा जयपुर के ज़ाकिर खान की यह पहल इस बात की याद दिलाती है कि किसी प्रियजन की याद में दुआ करने के साथ-साथ ज़रूरतमंदों की मदद करना, बच्चों की हौसला-अफ़ज़ाई करना और इल्म हासिल करने वालों की ख़िदमत करना भी नेक और सराहनीय कार्य हैं।
इन आयोजनों से यह संदेश मिलता है कि इंसान के दुनिया से चले जाने के बाद भी उसके चाहने वाले उसे अपनी दुआओं में याद रखते हैं। सच्चे रिश्तों की पहचान यही है कि जुदाई के बाद भी अपनापन और ख़ैरख़्वाही का सिलसिला जारी रहता है।
मरहूम फ़ैज़ सैफ़ी के इंतिक़ाल और उनके चालीसवें के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम हमें ज़िंदगी की नश्वरता और इंसानियत की अहमियत का एहसास कराते हैं। माता-पिता के लिए जवान बेटे की जुदाई एक ऐसी आज़माइश है, जिसे सहन करने के लिए असाधारण हौसले और सब्र की ज़रूरत होती है। ऐसे समय में लोगों की हमदर्दी, साथ और दिल से निकली दुआएं परिवार को संबल देती हैं।
अल्लाह तआला मरहूम मोहम्मद फ़ैज़ सैफ़ी की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, उन्हें अज़ाब-ए-क़ब्र से महफ़ूज़ रखे और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए। उनके तमाम अहले-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए और इस गहरे सदमे को सहन करने की ताक़त दे। आमीन या रब्बुल आलमीन।
मरहूम के चाहने वालों और परिजनों से भी गुज़ारिश है कि वे उन्हें हमेशा अपनी दुआओं में याद रखें।

