अबरार अहमद खान/मुकीज़ खान, भोपाल (मप्र), NIT:
राजधानी भोपाल में संचालित सरकारी संजीवनी क्लिनिक में इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों को डॉक्टर द्वारा लिखी गई पर्ची क्यों नहीं उपलब्ध करवाई जा रही है, इसे लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। मरीज़ों का कहना है कि डॉक्टर को दिखाने के बाद यदि दवा लिखी जाती है, तो उन्हें यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि डॉक्टर ने कौन-सी दवा, कितनी मात्रा में और कितने समय तक लेने की सलाह दी है।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के पेशेवर आचरण संबंधी नियमों में डॉक्टर द्वारा विधिवत प्रिस्क्रिप्शन उपलब्ध कराने तथा उसमें आवश्यक चिकित्सकीय विवरण दर्ज करने का प्रावधान है। प्रिस्क्रिप्शन की फोटो, स्कैन अथवा डिजिटल कॉपी उपलब्ध कराने की व्यवस्था का भी उल्लेख नियमों में किया गया है।

ऐसे में सवाल यह है कि सरकारी संजीवनी क्लिनिक में डॉक्टर द्वारा मरीज की जांच के बाद लिखे गए प्रिस्क्रिप्शन की प्रति मरीज को दी जा रही है या नहीं? यदि पर्ची नहीं दी जाती, तो क्या इसके पीछे कोई अलग सरकारी SOP या विभागीय आदेश है?
मरीजों का कहना है कि पर्ची मिलने से उन्हें भविष्य में दोबारा इलाज कराने, दूसरी जगह डॉक्टर को दिखाने या पहले से चल रही दवाओं की जानकारी देने में सुविधा होती है। इसके अलावा लिखित प्रिस्क्रिप्शन मरीज के उपचार का महत्वपूर्ण रिकॉर्ड भी होता है।
स्वास्थ्य विभाग से मांग की गई है कि संजीवनी क्लिनिक में मरीजों को डॉक्टर की लिखी पर्ची देने के संबंध में लागू नियम, SOP या विभागीय आदेश सार्वजनिक किया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि यदि किसी मरीज को न तो कागजी पर्ची दी जाती है और न ही डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन उपलब्ध कराया जाता है, तो इसकी शिकायत किस अधिकारी के समक्ष की जा सकती है।
सरकारी संजीवनी क्लिनिक में इलाज कराने वाले मरीज को जब डॉक्टर दवा लिखता है, तो क्या उसे उस प्रिस्क्रिप्शन की प्रति मिलनी चाहिए? स्वास्थ्य विभाग को इस सवाल पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए, ताकि मरीजों के अधिकार और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्था को लेकर किसी तरह की भ्रम की स्थिति न रहे।

