मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:
साहित्य जगत (अदबी दुनिया) और शायरी की दुनिया के लिए बेहद दुखद खबर है। बुरहानपुर के मशहूर शायर, बाल साहित्यकार और उस्ताद बिस्मिल्लाह अदीम का लंबी बीमारी के बाद इंतकाल हो गया। उनके निधन से शहर की अदबी महफिलों में शोक की लहर व्याप्त है। उनके चाहने वालों, साहित्यकारों और शायरी से जुड़े लोगों ने गहरे दुख का इजहार करते हुए उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश किया है।
शायर एवं एडवोकेट आबिद खान द्वारा दिवंगत शायर की विदाई पर लिखी गई ये पंक्तियां उनके अदबी योगदान को बखूबी बयां करती हैं—
शमा-ए-बज़्म-ए-सुख़न बुझ गई, दूर तक फैली थी जिसकी रोशनी।
उस्ताद बिस्मिल्लाह अदीम बुरहानपुरी ने अपनी शायरी और साहित्यिक रचनाओं के जरिए अदब की दुनिया में अलग पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में नातिया कलाम की खास अहमियत रही। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘जल्वा-ए-नूर’, ‘लफ़्ज़ों की कायनात’ और बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तक ‘तितली के पर’ शामिल हैं। उनकी रचनाएं साहित्य और शायरी के प्रति उनकी लगन तथा बाल साहित्य में उनके योगदान की याद दिलाती रहेंगी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मरहूम की उम्र लगभग 70 वर्ष थी। उनकी नमाज-ए-जनाजा शिकारपुरा, महाजना पेठ स्थित पानी की टंकी के पास की मस्जिद में अदा की गई, जिसमें अबू बकर साहब ने नमाज पढ़ाई। बाद में उन्हें चीता हरण कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके परिवार में दो बेटे और चार बेटियां हैं। उनकी पत्नी का इंतकाल पहले ही हो चुका था।
उस्ताद बिस्मिल्लाह अदीम बुरहानपुरी का जाना बुरहानपुर की साहित्यिक दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी शायरी, अदबी सेवाएं और रचनाएं उन्हें हमेशा याद दिलाती रहेंगी। उनकी कमी साहित्यिक महफिलों में लंबे समय तक महसूस की जाएगी।
अल्लाह तआला मरहूम की मगफिरत फरमाए, उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता करे और तमाम परिजनों व चाहने वालों को सब्र-ए-जमील अता फरमाए। आमीन।

