सलीम भाई ठेकेदार (सदर साहब) का इंतिक़ाल, नेकदिल इंसान के रूप में बनाई पहचान, 17 वर्षों तक मस्जिद हज़रत निज़ामुद्दीन (चूड़ी वाली मस्जिद) के सदर रहे; दाई अंगा कब्रिस्तान में किया गया सुपुर्द-ए-खाक | New India Times

मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

मरहूम मोहम्मद गफूर उर्फ मरू मियां साहब के परिवार में यह खबर बेहद दुख के साथ सुनी जाएगी कि उनके बेटे सलीम भाई ठेकेदार उर्फ सदर साहब का लगभग 73 वर्ष की उम्र में इंतिक़ाल हो गया। मरहूम लंबे समय से बीमार थे और कैंसर जैसे असाध्य रोग से पीड़ित थे। उनके इंतिक़ाल से परिजनों, रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों में शोक की लहर फैल गई।

मरहूम सलीम भाई ठेकेदार, स्वर्गीय मोहम्मद गफूर उर्फ मरू मियां साहब के पुत्र थे। वे एक नेकदिल, मिलनसार और दीनदार इंसान के रूप में पहचाने जाते थे। नमाज़ और रोज़े के पाबंद सलीम भाई ने अपनी ज़िंदगी में धार्मिक मूल्यों को अहमियत दी। वे 17 वर्षों तक मस्जिद हज़रत निज़ामुद्दीन, जिसे चूड़ी वाली मस्जिद के नाम से भी जाना जाता है, आज़ाद नगर के सदर रहे। इस दौरान मस्जिद से जुड़े उनके योगदान और धार्मिक सेवाओं के कारण लोगों के बीच उनकी अलग पहचान बनी रही।

मस्जिद में अदा की गई नमाज़-ए-जनाज़ा

सोमवार को आज़ाद नगर स्थित उनके पुश्तैनी मकान से दोपहर 1:30 बजे जनाज़ा निकाला गया। मस्जिद हज़रत निज़ामुद्दीन (चूड़ी वाली मस्जिद) में धार्मिक विद्वान मौलवी नदीम बेग साहब इशाअती ने नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करवाई। इसके बाद मरहूम को दाई अंगा कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। इस मौके पर परिजनों, रिश्तेदारों, परिचितों और समाज के लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी।

जमात-ए-इस्लामी बुरहानपुर के दिवंगत अमीर की बेटी से हुआ था विवाह

मरहूम सलीम भाई ठेकेदार का विवाह जमात-ए-इस्लामी के पूर्व अमीर स्वर्गीय अब्दुल जब्बार ग़ाज़ी साहब की बेटी से हुआ था। वे जमात-ए-इस्लामी के वर्तमान अमीर जमील अहमद ग़ाज़ी के बहनोई थे। मरहूम सलीम भाई ठेकेदार के परिवार में पत्नी, दो बेटे और दो बेटियां हैं।

मरहूम के इंतिक़ाल पर राजगीर फैमिली सहित परिचितों और शुभचिंतकों ने गहरे दुख का इज़हार करते हुए शोकाकुल परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त कीं।

अल्लाह तआला मरहूम सलीम भाई ठेकेदार की मगफिरत फरमाए, उनकी कब्र को नूर से मुनव्वर करे, उनकी नेकियों को कुबूल फरमाए और जन्नतुल फिरदौस में आला से आला मकाम अता फरमाए। साथ ही, तमाम परिजनों को इस दुख को सहन करने के लिए सब्र-ए-जमील अता फरमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

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