वी.के. त्रिवेदी, ब्यूरो चीफ, लखीमपुर खीरी (यूपी), NIT:
जनपद खीरी के किसानों ने इस बार कमाल कर दिया है। जिला प्रशासन की सख्ती, कृषि विभाग की लगातार जागरूकता और किसानों की समझदारी से पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी रोक लगी है। पिछले छह वर्षों के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक के पीक सीजन में पराली जलाने की एक भी घटना सामने नहीं आई है। कृषि विभाग के आंकड़े इस बदलाव की गवाही दे रहे हैं।
गुरुवार को इसी जागरूकता अभियान को और गति देने के लिए कृषि विभाग द्वारा जनपद के सभी विकासखंडों में एक महीने तक चलाए जाने वाले पराली जागरूकता प्रचार वाहन को सदर विधायक योगेश वर्मा ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह प्रचार वाहन गांव-गांव जाकर किसानों को पराली न जलाने और उसका खेत में ही प्रबंधन करने के फायदे बताएगा। किसानों को जानकारी दी जाएगी कि पराली को काटकर खेत की मिट्टी में मिलाने से भूमि में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है और उसकी उर्वरा शक्ति में सुधार होता है। फसल अवशेषों को खेत में ही सड़ाकर खाद बनाना उनके प्रबंधन का एक बेहतर उपाय है।
जिला प्रशासन ने पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए जिला और तहसील स्तर के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं तथा लगातार निगरानी कराई जा रही है। इसका असर आंकड़ों में साफ दिखाई दे रहा है। वर्ष 2020 में पराली जलाने की 30 घटनाएं, 2021 में 39, 2022 में 8, 2023 में 3, 2024 में 7 और 2025 में 9 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि वर्ष 2026 में यह आंकड़ा शून्य रहा है।
अब पराली किसानों के लिए बोझ नहीं, बल्कि आय का साधन बन रही है। गौशालाओं में पराली खरीदी जा रही है। इसके अलावा, इसे बदायूं और बाराबंकी स्थित सीबीजी (कंप्रेस्ड बायोगैस) प्लांटों में भी भेजा जा रहा है। कृषि विभाग द्वारा इन-सीटू योजना के अंतर्गत अनुदान पर उपलब्ध कराए जा रहे कृषि यंत्रों की मदद से फसल अवशेष प्रबंधन में अच्छी प्रगति हुई है। इसके परिणामस्वरूप किसान जागरूक होकर पराली प्रबंधन की दिशा में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
उप कृषि निदेशक ने सभी कृषक भाइयों से अपील की है कि वे इस सकारात्मक पहल को इसी तरह जारी रखें, ताकि भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहे और मानव स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहे।

